वो धूप थोड़ी ख़ास थी
कैसे बयां करूँ
बहुत दिनों से आस थी
कैसे बयां करूँ
कुर्बत के एक सिरे को
पकडे खड़ा था मैं
अरसे से इसी ज़िद्द पे
जमकर अड़ा था मैं
आज तू भी कितने पास थी
कैसे बयां करूँ
उमंगों की महफ़िल थी
कैसे बयां करूँ
अदाएं तेरी कातिल थीं
कैसे बयां करूँ
जज़्बातों के मज़मून
किताबों से पढ़ दिए
तस्वीरों से वो लम्हे
यूँ यादों में जड़ दिए
उस टीले पे झिलमिल थी
कैसे बयां करूँ
बातों में एक रुझान था
कैसे बयां करूँ
रूमानी आस्मान था
कैसे बयां करूँ
चाय के गर्म प्याले का
नसीब देख लो
चुस्की भी लेलो चाव से
और हाथ सेख लो
मेरा भी वो अरमान था
कैसे बयां करूँ
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