Monday, January 31, 2022

ख़ास धूप

 वो धूप थोड़ी ख़ास थी

कैसे बयां करूँ

बहुत दिनों से आस थी 

कैसे बयां करूँ

कुर्बत के एक सिरे को

पकडे खड़ा था मैं

अरसे से इसी  ज़िद्द पे

जमकर अड़ा था मैं 

आज तू भी कितने पास थी

कैसे बयां करूँ 


उमंगों की महफ़िल थी 

कैसे बयां करूँ 

अदाएं तेरी कातिल थीं 

कैसे बयां करूँ 

जज़्बातों के मज़मून 

किताबों से पढ़ दिए

तस्वीरों से वो लम्हे 

यूँ यादों में जड़ दिए 

उस टीले पे झिलमिल थी 

कैसे बयां करूँ 

 

बातों में एक रुझान था 

कैसे बयां करूँ

रूमानी आस्मान था 

कैसे बयां करूँ 

चाय के गर्म प्याले का 

नसीब देख लो 

चुस्की भी लेलो चाव से

और हाथ सेख लो 

मेरा भी वो अरमान था

कैसे बयां करूँ 


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