Sunday, March 2, 2025

तुम्हें पता क्या tumhein pata kya

तुम्हें पता क्या तुम्हारा आँचल

हवा को क्या क्या बता रहा है

तुम्हारे दामन से यूं लिपटके

वो राज़-ऐ-उल्फत जता रहा है

ये जो खज़ाना मासूमियत का

मुआशरों में नुमाइशी है 

उसी के पीछे छुपी शरारत 

ज़माने भर को दिखा रहा है


ये चिलमनों की तहें हटाकर   

कह जाती हो तुम जो एक नज़र में

उसी नज़र को जो हम पढ़ें तो

लगे है पूरा खत आ रहा है


इश्क़ और जंग में सही गलत क्या

रिवायतों से हम हैं मुखातिब 

सही सही की राह चले पर  

ख्याल मन में गलत आ रहा है


तुम्हारे गालों पे लट तुम्हारी 

ये हरकतें कर रहीं है कैसी 

सम्भालो ज़ुल्फ़ें इरादा इनका

सुलझे हुओं को उलझा रहा है 


हमारे शेरों में वो ज़राफ़त 

को सुनके तुमने इशारा समझा  

फिर जो तबस्सुम छुपाई तुमने

हमारा दिल मुस्कुरा रहा है 


गली से गुज़री झुकाये नज़रें  

सड़क पे शायद रही तवज्जु

पलट के देखा हमें तो समझे 

हमारा जादू भी छा रहा है

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