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Tuesday, December 17, 2024

केकई kekayi

ये क्या मांग लिया केकई ने

मर्यादा को पार किया

ममता की हुंकार सुनी और

रामचंद्र पे वार किया

नियम नहीं तोड़े अपने  

वरदानों का भोग था वो

उसकी नियति में उपयुक्त 

समय का संजोग था वो 

उसको हम ठहराएं दोषी

दृष्टिकोण अपना अपना

महत्वाकांक्षा ने जिसकी

देखा स्वार्थ भरा सपना

भाग्य से जो लड़ना हो तो

संघर्ष तो करना होगा

निःस्वार्थता की देवी को  

कई बार मरना होगा 

साम दाम और दंड भेद हैं

हर एक केकई के हथियार 

उसका सच है उसका सपना

व्यर्थ है अन्य हर विचार 

कसौटी जब ममता की हो 

तो केकई के इस व्यवहार 

में दिख जायेगा तुमको भी 

एक माँ का असीमित प्यार 

रामचंद्र ने भी केकई को

इसी लिए सम्मान दिया 

हम ही उसको दुष्ट माने और

खलनायक का स्थान दिया