Thursday, October 4, 2018

ख्वाहिश

ख्वाहिशों का बादल
आसमान में उड़ता रहा
ज़रूरतों के वज़न से
मैं ज़मीन से जुड़ता रहा

ऊंचाइयों की ललक में जो
मैं बेबाक लपकता रहा
वो बादल ख्वाहिशों का
थोड़ा थोड़ा टपकता रहा

ये कैसी बरसात थी
के प्यास तो तरी नहीं
ख्वाहिशों की ख्वाहिश में
ज़िन्दगी की गागर भरी नहीं

गागर, सागर, नदी , तालाब
सब तो मेरे वश में थे
पानी के हज़ारों रंग सब
मेरे आँगन के कलश में थे

एक दिन उतार लिया बादल को
ये करिश्मा भी हो गया
हाथ लगा सिर्फ धुंद घना
और मेरे घर का रस्ता खो गया

Tuesday, July 24, 2018

पतंग

मांझे और चकरी से जुड़ना पड़ेगा

पतंग हूँ, इशारों पे उड़ना पड़ेगा !

गली से मेरी वो गुज़रती तो होगी

वो गली से मेरी गुज़रती तो होगी
यादें मेरी कुछ हरकत करती तो होगी
वो खिड़की के परदे पे परछाईं मेरी
देख कर ठंडी आहें वो भरती तो होगी
वो गली से मेरी गुज़रती तो होगी

कोई शक़्स गर बगल से निकल जाये तो
अंदाज़ में जिसके मेरी झलक आये तो
नज़रें चुराकर वो पल्लू की आड़ से 
उसकी सूरत पे वो गौर करती तो होगी
वो गली से मेरी गुज़रती तो होगी

उस नुक्कड़ पे जहां मिल ही जाता था मैं
वो ही धुन जो कभी गुनगुनाता था मैं
आज भी उन दीवारों से टकरा टकरा कर
गूँज कर उसके दिल में उतरती तो होगी
वो गली से मेरी गुज़रती तो होगी

कोई वाक़िफ़ यकायक ही भिड़ जाये जो
सवाल ये पेचीदा सा  छिड़ जाये जो
पूछ ले वो यहां फिरने का असली सबब 
इस ख़याल से थोड़ा वो डरती तो होगी
वो गली से मेरी गुज़रती तो होगी

वो पूछती नहीं और मैं भी कहता नहीं
उस गली में मगर अब मैं रहता नहीं
ढून्ढ ले जा पर गली में मेरी रूह को
वो वहीँ तेरा इंतज़ार करती तो होगी
वो गली से मेरी गुज़रती तो होगी

Thursday, May 17, 2018

तेरा हुनर तो हरकत करता रहेगा

आज चकाचौंद है ये रात तेरी
हर महफ़िल में होती है बात तेरी
कहीं जश्न तो कहीं ज़र्रानवाज़ी भी है
कहीं तारीफों की आतिशबाज़ी भी है
जो सन्नाटा था कल तक वो आज नहीं
पर तू इस शोहरत की मोहताज नहीं 
तेरा जज़्बा तो बरकत करता रहेगा
तेरा हुनर तो हरकत करता रहेगा

Thursday, April 12, 2018

दर्द

जिस्मानी दर्द का क्या कहिये
यह मलहम के मोहताज हैं
वो रूहानी दर्द हैं कम्बख्त
जो बिलकुल ला-इलाज हैं

Monday, February 19, 2018

सर्द सुबह

सर्द सुबह की तन्हाई में
तेरे ख्यालों की रज़ाई में
लिपटे रहें कुछ देर और

वक़्त के कोहरे में छेद कर
यादों के धुंद को कुरेद कर
तकते रहें कुछ देर और

कमज़ोर से सूरज की अकड़ पर
उम्मीद की किरण को जकड़ कर
लटके रहे कुछ देर और

आंसू को ओस का नाम देकर
लव्ज़ों के फेर को अंजाम देकर
लिखते रहें कुछ शेर और

Friday, September 15, 2017

एक शायरा से मुलाक़ात

शायरी की भूलभुलैया में
उजाले भी हैं, अँधेरे भी हैं
ग़मों के घाव, ख़ुशी के दाव
कुछ तेरे हैं, कुछ मेरे भी हैं 

ख्वाहिशों की कश्मकश है ये
जुस्तजू की सल्तनत भी है
बेबाक इज़हार गहराइयों के
सही भी हैं, कुछ गलत भी हैं

जज़्बातों की इस महफ़िल में
हद है भी नहीं, दायरा भी है
लव्ज़ों की मुबाशरत है यह
शायर भी है, शायरा भी है