वो गली से मेरी गुज़रती तो होगी यादें मेरी कुछ हरकत करती तो होगी वो खिड़की के परदे पे परछाईं मेरी देख कर ठंडी आहें वो भरती तो होगी वो गली से मेरी गुज़रती तो होगी
कोई शक़्स गर बगल से निकल जाये तो अंदाज़ में जिसके मेरी झलक आये तो नज़रें चुराकर वो पल्लू की आड़ से उसकी सूरत पे वो गौर करती तो होगी वो गली से मेरी गुज़रती तो होगी
उस नुक्कड़ पे जहां मिल ही जाता था मैं वो ही धुन जो कभी गुनगुनाता था मैं आज भी उन दीवारों से टकरा टकरा कर गूँज कर उसके दिल में उतरती तो होगी वो गली से मेरी गुज़रती तो होगी
कोई वाक़िफ़ यकायक ही भिड़ जाये जो सवाल ये पेचीदा सा छिड़ जाये जो पूछ ले वो यहां फिरने का असली सबब इस ख़याल से थोड़ा वो डरती तो होगी वो गली से मेरी गुज़रती तो होगी
वो पूछती नहीं और मैं भी कहता नहीं उस गली में मगर अब मैं रहता नहीं ढून्ढ ले जा पर गली में मेरी रूह को वो वहीँ तेरा इंतज़ार करती तो होगी वो गली से मेरी गुज़रती तो होगी
आज चकाचौंद है ये रात तेरी हर महफ़िल में होती है बात तेरी कहीं जश्न तो कहीं ज़र्रानवाज़ी भी है कहीं तारीफों की आतिशबाज़ी भी है जो सन्नाटा था कल तक वो आज नहीं पर तू इस शोहरत की मोहताज नहीं तेरा जज़्बा तो बरकत करता रहेगा तेरा हुनर तो हरकत करता रहेगा
शायरी की भूलभुलैया में उजाले भी हैं, अँधेरे भी हैं ग़मों के घाव, ख़ुशी के दाव कुछ तेरे हैं, कुछ मेरे भी हैं
ख्वाहिशों की कश्मकश है ये जुस्तजू की सल्तनत भी है बेबाक इज़हार गहराइयों के सही भी हैं, कुछ गलत भी हैं जज़्बातों की इस महफ़िल में हद है भी नहीं, दायरा भी है लव्ज़ों की मुबाशरत है यह शायर भी है, शायरा भी है
महफ़िल में हर शख्स लाया कुछ यादों के चिराग चौंधिया गयीं आँखें जब मिलके जली वो आग पिघल गए इस आग में वो उम्र के नकाब नशा बोतलों में नहीं हंसी की थी शराब ज़िन्दगी के तजुर्बे थे कुछ मीठे कुछ खट्टे थे कुछ आगे कुछ पीछे पर सब एक थाली के चट्टे बट्टे थे मेरी नज़र से देखो तो हसीनाएं सब हसीन थीं चेहरे पे झुर्रियां थीं मगर बहुत बहुत महीन थीं सच पूछो जष्न मनाने के इरादे रात भर के थे महफ़िल बिखरी सौ बहानों से तकाज़े असल उमर के थे !