एक छोटी सी खिड़की से
क्या क्या बसर हुआ
लगता हवा का झोंका था
तूफां सा असर हुआ
चाँद मासूम लगता था
चंचल तो चांदनी थी
थिरकती रही नज़रों में
पलकों में बांधनी थी
वो नोंक झोंक की चिलमन
जो सरकाई धीरे धीरे
एक हसीन शख्सियत
नज़र आयी धीरे धीरे
ये खिड़की खुली है
और खुली ही रहेगी
उम्मीद उन अदाओं से
चुलबुली ही रहेगी
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