दराज़ों में वो कागज़ हैं जिन्हें स्याही नहीं भाई
वो लव्ज़ों का तकाज़ा था के आँखें मेरी भर आईं
लिखावट और मेरे आंसूं लिपट के यूं जो रोये थे
के गल के बह गयी वो नज़्म जो फिर लिक्खी न दोहराई
हुनर मेरे कलम का तो ज़माने को न रास आया
मुहब्बत की फतह का गीत अकेले मैंने ही गाया
कदरदानों की महफ़िल में बिके थे शेर बस इस खातिर
के अपने दिल के घावों को ही मैंने पेश फ़रमाया
सफेदी है जो बालों में वही तो स्याही है मेरी
वो किस्से हैं मुहब्बत के वही रुबाई है मेरी
वो बेरंग हैं ये कागज़ और वो बेरंग है ये स्याही भी
इसे पढ़ना नहीं आसान के ये तन्हाई है मेरी
अभी उम्मीद नहीं छोड़ी के मेरे शेर पढ़ोगी तुम
वो पत्थर दिल भी पिघलेगा के मेरी ओर बढ़ोगी तुम
वो कागज़ जो दराज़ों में छुपे बैठे थे इतने दिन
के अपनी सुर्ख वफाओं से हाँ उनपर कुछ लिखोगी तुम
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