Sunday, June 13, 2021

दराज़ों में कागज़

 दराज़ों में वो कागज़ हैं जिन्हें स्याही नहीं भाई

वो लव्ज़ों का तकाज़ा था के आँखें मेरी भर आईं 

लिखावट और मेरे आंसूं लिपट के यूं जो रोये थे

के गल के बह गयी वो नज़्म जो फिर लिक्खी न दोहराई


हुनर मेरे कलम का तो ज़माने को न रास आया

मुहब्बत की फतह का गीत अकेले मैंने ही गाया 

कदरदानों की महफ़िल में बिके थे शेर बस इस खातिर

के अपने दिल के घावों को ही मैंने पेश फ़रमाया 


सफेदी है जो बालों में वही तो स्याही है मेरी

वो किस्से हैं मुहब्बत के वही रुबाई है मेरी

वो बेरंग हैं ये कागज़ और वो बेरंग है ये स्याही भी

इसे पढ़ना नहीं आसान  के ये तन्हाई है मेरी


अभी उम्मीद नहीं छोड़ी के मेरे शेर पढ़ोगी तुम

वो पत्थर दिल भी पिघलेगा के मेरी ओर बढ़ोगी तुम

वो कागज़ जो दराज़ों में छुपे बैठे थे इतने दिन

के अपनी सुर्ख वफाओं से हाँ उनपर कुछ लिखोगी तुम


No comments:

Post a Comment