Thursday, October 17, 2024

वजह vajah

तय शुदा समय नहीं हो, कुछ उलझी गिरेह नहीं हो

तेरे पास वक़्त गुज़ारूं पर कुछ वजह नहीं हो


ये दूरी की दिक्कतें हैं  के मकसद को ढूंढ़ती हैं

किस बिना पे राब्ता हो जो वाजिब बिना नहीं हो


फासलों का खालीपन ये रातों में गूंजता है

ये सिलसिला रहेगा जब तक सुबह नहीं हो


मशग़ूलियत है तेरी और मेरी मुश्किलें हैं

ये तो कश्मकश रहेगी जब तक सुलह नहीं हो


ये मुआशरा है कैसा तुझे चाहना गुनाह है

कोई जगह तो हो जहां इश्क़ गुनाह नहीं हो 


लिख लिख के मैं कसीदे भरता हूँ डायरी में

लिखता रहूँ मैं जब तक आखरी सफह नहीं हों


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