Friday, September 11, 2020

अनजानों का मजमा

अनजानों का मजमा
फासलों को भरता है
वाकिफ तो दूरियों का
अहसास दिलाते हैं

दूर जो मशाल 
जल रही है तेरी
देख उसे अंधेरों में
हम सुकून पाते हैं

वक़्त की सुरंग में
गुंजाइश नहीं है रुकने की
गुज़रते लम्हों के पाँव 
हमें कुचले जाते हैं

तुम खड़े रहना 
अपनी बाहें फैलाए
हम न सही हमारे ख़याल
वहीँ डेरा जमाते हैं

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