अनजानों का मजमा
फासलों को भरता है
वाकिफ तो दूरियों का
अहसास दिलाते हैं
दूर जो मशाल
जल रही है तेरी
देख उसे अंधेरों में
हम सुकून पाते हैं
वक़्त की सुरंग में
गुंजाइश नहीं है रुकने की
गुज़रते लम्हों के पाँव
हमें कुचले जाते हैं
तुम खड़े रहना
अपनी बाहें फैलाए
हम न सही हमारे ख़याल
वहीँ डेरा जमाते हैं
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