लहरों का बैर कश्ती से नहीं
उलझती वो अपने ही पानी से हैं
माझी उन लहरों से जूझेगा ज़रूर
पर रिश्ता तो उसका रवानी से है
हवाएं भी रुख बदलती रहेंगी
सरोकार अपनी तर्जुमानी से है
साहिल कई हैं, ठिकाना कहाँ है?
फैसला ये मेरी मनमानी से है
मौसम बदलेंगे और बारिश भी होगी
ये तमाम रंग मेरी कहानी से हैं
जल परियां भी होंगी सफर में कई
मेरा इश्क़ तो बस एक दीवानी से है
लहरों का बैर कश्ती से नहीं
उलझती वो अपने ही पानी से हैं
No comments:
Post a Comment