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Saturday, March 22, 2025

छिड़ी हुई है जंग chidi hui hai jang

छिड़ी हुई है जंग कहीं दूर दराज़ में

बारूद और चीखें घुलें एक आवाज़ में  

पिस रहे हैं लोग याहवेह खुदा के बीच 

और दुआ मांगते हैं  शुमाह और नमाज़ में 

छिड़ी हुई है जंग कहीं दूर दराज़ में


हैं सब सियासतें तमाशाई इस कदर

के हल ढूंढ़ती हैं महज़ अलफ़ाज़ में 

छिड़ी हुई है जंग कहीं दूर दराज़ में 


हार जीत  सरहदें हैं मसला-ऐ-ज़िन्दगी 

और जान चल रही है मौत के मिज़ाज में    

छिड़ी हुई है जंग कहीं दूर दराज़ में 


शतरंज नहीं है ये इस बिसात में है खून

ऐतबार करें तो प्यादे किस चाल बाज़ में 

छिड़ी हुई है जंग कहीं दूर दराज़ में 


मंडरा रहे हैं गिद्द मुर्दों को नोचते हैं

एक और जंग छिड़ेगी चील और बाज़ में 

छिड़ी हुई है जंग कहीं दूर दराज़ में   


अब गले से लगा लो एक दुसरे का दीन

और कुछ नहीं रक्खा है इस अमन के राज़ में

छिड़ी हुई है जंग कहीं दूर दराज़ में  

Sunday, December 1, 2024

मेरी इल्मी शहज़ादी meri ilmi shehzaadi

किस मुँह से मैं इज़हार करूँ

किस हक़ से तुझको प्यार करूँ 

मैं मुफ़लिस हूँ, तू रानी है

ये दर्जे कैसे पार करूँ

किस हक़ से तुझको प्यार करूँ 


तू तो इल्मी शहज़ादी है

दानिश्वरियों  की आदि है 

मैं ठहरा इतना अल्हड़ 

तुझसे बातें क्या चार करूँ 

किस हक़ से तुझको प्यार करूँ 


तेरे लहज़े से ज़ाहिर है

तू नफ़ासतों में माहिर है

होड़ है तेरी महफ़िल में

कितना मैं इंतज़ार करूँ

किस हक़ से तुझको प्यार करूँ 


मैं आशिक़ हूँ के कायर हूँ

एक दो कौड़ी का शायर हूँ

लव्ज़ों के पुल ही बांधूंगा

कैसे उनको साकार करूँ

किस हक़ से तुझको प्यार करूँ