Monday, February 19, 2018

सर्द सुबह

सर्द सुबह की तन्हाई में
तेरे ख्यालों की रज़ाई में
लिपटे रहें कुछ देर और

वक़्त के कोहरे में छेद कर
यादों के धुंद को कुरेद कर
तकते रहें कुछ देर और

कमज़ोर से सूरज की अकड़ पर
उम्मीद की किरण को जकड़ कर
लटके रहे कुछ देर और

आंसू को ओस का नाम देकर
लव्ज़ों के फेर को अंजाम देकर
लिखते रहें कुछ शेर और

Friday, September 15, 2017

एक शायरा से मुलाक़ात

शायरी की भूलभुलैया में
उजाले भी हैं, अँधेरे भी हैं
ग़मों के घाव, ख़ुशी के दाव
कुछ तेरे हैं, कुछ मेरे भी हैं 

ख्वाहिशों की कश्मकश है ये
जुस्तजू की सल्तनत भी है
बेबाक इज़हार गहराइयों के
सही भी हैं, कुछ गलत भी हैं

जज़्बातों की इस महफ़िल में
हद है भी नहीं, दायरा भी है
लव्ज़ों की मुबाशरत है यह
शायर भी है, शायरा भी है


Thursday, September 7, 2017

पोस्ट पार्टी ऑब्ज़र्वेशन्स


महफ़िल में हर शख्स लाया
कुछ यादों के चिराग
चौंधिया गयीं आँखें
जब मिलके जली वो आग

पिघल गए इस आग में
वो उम्र के नकाब
नशा बोतलों में नहीं
हंसी की थी शराब

ज़िन्दगी के तजुर्बे थे
कुछ मीठे कुछ खट्टे थे
कुछ आगे कुछ पीछे पर सब 
एक थाली के चट्टे बट्टे थे

मेरी नज़र से देखो तो
हसीनाएं सब हसीन थीं
चेहरे पे झुर्रियां थीं मगर
बहुत बहुत महीन थीं

सच पूछो जष्न मनाने के 
इरादे रात भर के थे
महफ़िल बिखरी सौ बहानों से 
तकाज़े असल उमर के थे !

Sunday, July 16, 2017

अंधेरों के खंजर

अंधेरों के खंजर मंज़ूर नहीं
मेरी नाज़ुक कली मजबूर नहीं
जंग रोशनी की लड़ लेगी वो
घाव गहरे हैं मगर नासूर नहीं
अंधेरों के खंजर मंज़ूर नहीं

पर्दों की साज़िश बिखरेगी कभी
कली फूल बनकर निखरेगी अभी
सूरज का कतरा हथिया लेगी वो
अभी हौंसले उसके चूर नहीं
अंधेरों के खंजर मंज़ूर नहीं

रोशनी को सीने में बटोरेगी वो
धूप के गर्म प्यालों को पी लेगी वो
परछाइयों के गले काट देगी
अब ऐसा मंज़र भी दूर नहीं 
अंधेरों के खंजर मंज़ूर नहीं

तेरे संग हैं सिम्मी आगे तू बढ़
हर मुश्किल से बेफिक्र हो कर तू लड़
हर गलत साये को आग लगा दे
जो ज़हन को जकड़े, बेक़सूर नहीं
अंधेरों के खंजर मंज़ूर नहीं

Saturday, July 15, 2017

मुस्कान

तेरी याद को मेहमान समझा
धड़कनों को नादान समझा
क़त्ल कर गयी मुस्कान तेरी
जिसको महज़ मुस्कान समझा

कर लिया बिन सोचे समझे
जो  इश्क़ को आसान समझा 

चुरा गया खुशबू वो सारी
जिसेको  बागबान समझा 

घुटी दर्द की चीखें थीं वो 
जिन्हें अम्न का ऐलान समझा 

वो पिंजरा हालातों का था 
जिसे हमने मकान समझा 

आतिशबाज़ी गैरों की थीं 
हमने अपना आसमान समझा 

क्या क्या सितम सेह गए हम
तेरे इश्क़ का अंजाम समझा

Thursday, May 18, 2017

शहनाई

तेरे लव्ज़ों और ज़ुल्फ़ों में फर्क समझा दे
दोनों में शायरी बस्ती है शायद 
अल्फ़ाज़ों में उमंगें उलझें कुछ ऐसे
बालों में हवाओं की मस्ती है शायद 

तेरे लव्ज़ों और आँखों में फर्क समझा दे
दोनों में बहुत गहराई है शायद
अलफ़ाज़ कुरेदें कुछ छिपे हुए सच
आँखों में डूबी सच्चाई है शायद

तेरे लव्ज़ों और होठों में फर्क समझा दे
दोनों में रूह मुस्कुराती है शायद
अलफ़ाज़ जज़्बातों के कई राज़ खोलें
तबस्सुम कई राज़ छुपाती है शायद

तेरे लव्ज़ों और अदा में फर्क समझा दे
दोनों में कमाल की अंगड़ाई है शायद
अल्फ़ाज़ों के फेर मैं जादू है इतना
अंदाज़ की तेरे परछाई है शायद

तेरे लव्ज़ों और वजूद में फर्क समझा दे
एक दूजे को दोनों सजाते हैं शायद
अलफ़ाज़ शख्सियत का नौशा है और 
हम जैसे ?
हम जैसे शहनाई बजाते हैं शायद 

मेरे लव्ज़ों और हसरत में फर्क समझा दे
दोनों में कुछ बुत-परस्ती है शायद
इस उम्र में अंदाज़-ए-बयां है गर ऐसा
दोनों पे छुप कर तू हंसती है शायद 


Saturday, April 15, 2017

इंतज़ार

छिपकर देखा है मैंने  
तेरा अंदाज़-ए-इंतज़ार 
डूबते सूरज से चौंधियाई आँखें
राहों को बेरुखी से कुरेदती हैं
माथे पे फ़िक्र की शिकन भी है
होठों पे उमंगों की तबस्सुम भी
पूरा जिस्म तैनात है उस झलक के लिए
जिस झलक से पिघल जाएगा तनाव सारा
इंतज़ार मेरा नहीं, किसी और का है
इस रंजिश में गुज़ार देंगे ज़िन्दगी हम भी