Friday, December 6, 2019

आशिक़ तेरी मजबूरी

आशिक़ों की ये मजबूरी है एक जिगर में दर्द ज़रूरी है तेरे इंतज़ार में कहीं साकी है अभी इश्क़ पे शायरी बाकी है तू खुश है तो दास्ताँ अधूरी है

Monday, September 9, 2019

सिरहाना

रातों में कुछ तूफ़ान सा है
अँधेरा भी अनजान सा है
उमंगें कुछ मजबूर भी हैं
तारों की लौ कुछ दूर ही है
अमावस का वास चमन में है 
मेरा चाँद कोप भवन में है
दिल खाली आसमान सा है
एक सिरहाना सुनसान सा है 

ये कैसा रेगिस्तान सा है
सुकून यहाँ मेहमान सा है
रेतों के सरकते पाओं के
बवंडर हैं शंकाओं के
प्यासों का कोई ख्वाब है ये
चश्मा है या सराब है ये?
वो है तो नख्लिस्तान सा है
एक सिरहाना सुनसान सा है

ये कमरा बेज़ुबान सा है 
क़ैदख़ाना बेईमान सा है
यादों के कंकाल यहां
नींदों के हैं आकाल यहां
साँसों में टीस कहारों की
घुटन यहां दीवारों की
वो चेहरा रोशनदान सा है
एक सिरहाना सुनसान सा है

Saturday, June 1, 2019

शराब की तहकीकात

चला ज़िक्र तो हमने भी बात की 
यादों के धुंदले में खोई हुई रात की .

सुरूर ढून्ढ लेता है दर्द के ठिकानो को 
आज फिर इस शराब ने तहकीकात की.

बिन बुलाये मेहमान की तरह यारों 
आसुओं ने चेहरे पे बरसात की.

कहते हैं की वक़्त हर घाव भर देता है 
आस कब तक रखूँ  इस करामात की.

खून से तुझपर लिखता हूँ शायरी संजीव
कदर  नहीं तुझे क्या इस कीमती दवात की?

चला ज़िक्र तो हमने भी बात की 
यादों के धुंदले में खोई हुई रात की .

रुक जाता है

कभी  सोचता है होठों को तेरे 
छु ले मगर रुक जाता है
रुका न जो तीर-ओ-खंजर से
खा वार-ए-नज़र रुक जाता है
ढूंढ़ता फिरता है सुकून मुसाफिर जो 
पहुंचके तेरे घर रुक जाता है 
दिन के कारवां में झलक तेरी 
दिख जाये तो सफर रुक जाता है 
कभी  सोचता है होठों को तेरे 
छु ले मगर रुक जाता है

Wednesday, May 15, 2019

सपने

मैने सपने ज़मीन पर रेंगते देखे हैं 
न्हे ऊंचाइयों से गिराया है किसने?
ज़िन्दगी फिर भी दौड़ती फिरती है 
इसे अंजाम तक पहुँचाया है किसने?
ऊंचाइयां यहीं हैंसपने यहीं हैं
अपने दिल को आइना दिखाया है किसने?

कुदरत

बादल
बादलों ने कहाँ मंज़िलें तलाशी हैं
सफर में फना होना फितरत है इनकी

हवा
हवा तो मनचली है, यकायक रुख बदलती है
एक हम ही हैं जो रास्तों के मोहताज हैं

ओस और धूप
ओस और धूप का मन मुटाव मिटाना नहीं आता
चाहते तो हम भी हैं कौस-ओ-कज़ाह का जलवा

वक़्त की सुरंग

वक़्त की सुरंग में
गुंजाइश नहीं है रुकने की
गुज़रते लम्हों के पाँव 
मुझे कुचल के जाते हैं

तुम खड़े रहना 
अपनी बाहें फैलाए
मैं न सही मेरे ख़याल
वहीँ डेरा जमाते हैं

मेरी ख्वाहिशों से कहीं आगे 
निकल गयी यह उम्र
अब इन फासलों से ही सही
पर हम इश्क़ खूब निभाते हैं