आशिक़ों की ये मजबूरी है
एक जिगर में दर्द ज़रूरी है
तेरे इंतज़ार में कहीं साकी है
अभी इश्क़ पे शायरी बाकी है
तू खुश है तो दास्ताँ अधूरी है
Friday, December 6, 2019
Monday, September 9, 2019
सिरहाना
रातों में कुछ तूफ़ान सा है
अँधेरा भी अनजान सा है
उमंगें कुछ मजबूर भी हैं
तारों की लौ कुछ दूर ही है
अमावस का वास चमन में है
मेरा चाँद कोप भवन में है
दिल खाली आसमान सा है
एक सिरहाना सुनसान सा है
ये कैसा रेगिस्तान सा है
सुकून यहाँ मेहमान सा है
रेतों के सरकते पाओं के
बवंडर हैं शंकाओं के
प्यासों का कोई ख्वाब है ये
चश्मा है या सराब है ये?
वो है तो नख्लिस्तान सा है
एक सिरहाना सुनसान सा है
ये कमरा बेज़ुबान सा है
क़ैदख़ाना बेईमान सा है
यादों के कंकाल यहां
नींदों के हैं आकाल यहां
साँसों में टीस कहारों की
घुटन यहां दीवारों की
वो चेहरा रोशनदान सा है
एक सिरहाना सुनसान सा है
अँधेरा भी अनजान सा है
उमंगें कुछ मजबूर भी हैं
तारों की लौ कुछ दूर ही है
अमावस का वास चमन में है
मेरा चाँद कोप भवन में है
दिल खाली आसमान सा है
एक सिरहाना सुनसान सा है
ये कैसा रेगिस्तान सा है
सुकून यहाँ मेहमान सा है
रेतों के सरकते पाओं के
बवंडर हैं शंकाओं के
प्यासों का कोई ख्वाब है ये
चश्मा है या सराब है ये?
वो है तो नख्लिस्तान सा है
एक सिरहाना सुनसान सा है
ये कमरा बेज़ुबान सा है
क़ैदख़ाना बेईमान सा है
यादों के कंकाल यहां
नींदों के हैं आकाल यहां
साँसों में टीस कहारों की
घुटन यहां दीवारों की
वो चेहरा रोशनदान सा है
एक सिरहाना सुनसान सा है
Saturday, June 1, 2019
शराब की तहकीकात
चला ज़िक्र तो हमने भी बात की
यादों के धुंदले में खोई हुई रात की .
सुरूर ढून्ढ लेता है दर्द के ठिकानो को
आज फिर इस शराब ने तहकीकात की.
बिन बुलाये मेहमान की तरह यारों
आसुओं ने चेहरे पे बरसात की.
कहते हैं की वक़्त हर घाव भर देता है
आस कब तक रखूँ इस करामात की.
खून से तुझपर लिखता हूँ शायरी संजीव
कदर नहीं तुझे क्या इस कीमती दवात की?
चला ज़िक्र तो हमने भी बात की
यादों के धुंदले में खोई हुई रात की .
यादों के धुंदले में खोई हुई रात की .
सुरूर ढून्ढ लेता है दर्द के ठिकानो को
आज फिर इस शराब ने तहकीकात की.
बिन बुलाये मेहमान की तरह यारों
आसुओं ने चेहरे पे बरसात की.
कहते हैं की वक़्त हर घाव भर देता है
आस कब तक रखूँ इस करामात की.
खून से तुझपर लिखता हूँ शायरी संजीव
कदर नहीं तुझे क्या इस कीमती दवात की?
चला ज़िक्र तो हमने भी बात की
यादों के धुंदले में खोई हुई रात की .
रुक जाता है
कभी सोचता है होठों को तेरे
छु ले मगर रुक जाता है
रुका न जो तीर-ओ-खंजर से
खा वार-ए-नज़र रुक जाता है
ढूंढ़ता फिरता है सुकून मुसाफिर जो
पहुंचके तेरे घर रुक जाता है
दिन के कारवां में झलक तेरी
दिख जाये तो सफर रुक जाता है
कभी सोचता है होठों को तेरे
छु ले मगर रुक जाता है
छु ले मगर रुक जाता है
रुका न जो तीर-ओ-खंजर से
खा वार-ए-नज़र रुक जाता है
ढूंढ़ता फिरता है सुकून मुसाफिर जो
पहुंचके तेरे घर रुक जाता है
दिन के कारवां में झलक तेरी
दिख जाये तो सफर रुक जाता है
कभी सोचता है होठों को तेरे
छु ले मगर रुक जाता है
Wednesday, May 15, 2019
सपने
मैने सपने ज़मीन पर रेंगते देखे हैं
इन्हे ऊंचाइयों से गिराया है किसने?
ज़िन्दगी फिर भी दौड़ती फिरती है
इसे अंजाम तक पहुँचाया है किसने?
ऊंचाइयां यहीं हैं. सपने यहीं हैं
अपने दिल को आइना दिखाया है किसने?
इन्हे ऊंचाइयों से गिराया है किसने?
ज़िन्दगी फिर भी दौड़ती फिरती है
इसे अंजाम तक पहुँचाया है किसने?
ऊंचाइयां यहीं हैं. सपने यहीं हैं
अपने दिल को आइना दिखाया है किसने?
कुदरत
बादल
बादलों ने कहाँ मंज़िलें तलाशी हैं
सफर में फना होना फितरत है इनकी
हवा
हवा तो मनचली है, यकायक रुख बदलती है
एक हम ही हैं जो रास्तों के मोहताज हैं
एक हम ही हैं जो रास्तों के मोहताज हैं
ओस और धूप
ओस और धूप का मन मुटाव मिटाना नहीं आता
चाहते तो हम भी हैं कौस-ओ-कज़ाह का जलवा
वक़्त की सुरंग
वक़्त की सुरंग में
गुंजाइश नहीं है रुकने की
गुज़रते लम्हों के पाँव
मुझे कुचल के जाते हैं
तुम खड़े रहना
अपनी बाहें फैलाए
मैं न सही मेरे ख़याल
वहीँ डेरा जमाते हैं
मेरी ख्वाहिशों से कहीं आगे
निकल गयी यह उम्र
अब इन फासलों से ही सही
पर हम इश्क़ खूब निभाते हैं
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