Saturday, April 8, 2023

हद यही है मेरी ye hadd hai meri

तुझे दूर से निहारूं

बस हद मेरी यही है 

के दिल ही दिल में चाहूँ

किस्मत मेरी यही है

ये महफिलों के अपनी

क़ानून भी हैं ऐसे 

कुर्बत में फासले हैं

कुर्बत मेरी यही है


मसरूफ हो चला हूँ

ख़्वाबों के बादलों में

मसरूफियत को छोड़ो

फुर्सत मेरी यही है


तेरे कई इशारों

के तर्जुमे किये हैं

ये तर्जुमे सही हों 

हसरत मेरी यही है


रिश्तों की हथकड़ी है

पैरों में बेड़ियाँ हैं

ख्यालों में मेरी झूमो

राहत मेरी यही है


ये दायरे हैं जिनको

हैं फाँदना तो मुमकिन

माने ज़मीर कैसे 

दिक्कत मेरी यही है


मेरे अपने पूछते हैं

मैं उनके पास हूँ क्या?

मैं झूठ बोलता हूँ

लानत मेरी यही है


तेरा वजूद खोजूं

अपनों की शख्सियत में

फिर उनको ये जताऊं

चाहत मेरी यही है


Friday, February 24, 2023

फरक

 

हालातों पे

तवज्जु है

तेरी है बाएं 

मेरी है दाएं

तेरे सच और

मेरे सच में

मतभेदों 

के हैं साये 

जिरह कर ले

मेरे संग तू

ये साये तो

रहेंगे ही 

पर इनको दिल 

पे न लेना  

उजाले गुम 

न हो जाएं 


ये रिश्तों की 

नज़ाकत है 

चटक जाते 

हैं पल भर में 

चटक जाने

की नौबत हो

तो मुद्दों को

ही दफ़नायें 


ज़हरीले

ये मतभेदों

का बस एक तोड़ 

है यारों 

ठहाकों के

है मीठे जाम

इन्हें हम घोल 

पी जाएं 


Sunday, January 15, 2023

फितरत

 तेरी ये फितरत 

भी हो सकती है

हमसे मुहब्बत 

भी हो सकती है

करिश्मे होते 

देखे हैं वरना

जायज़ तो नफरत

भी हो सकती है

Saturday, October 29, 2022

फुलझड़ी

 


जिस नादान को दो वक़्त की रोटी नसीब न थी

 वो खैरात में मिली फुलझड़ी का क्या करेगा?

 सोचा तो यही था मैंने... पर उसकी मुस्कान देख कर

 लगा की ख़ुशी तो बहाना ढूंढ़ती है दिल में घर करने का

कच्चे रिश्ते

 गुज़रते वक़्त ने 

हलकी आंच की तरह

रिश्तों को सेका है.

आपसी ज़रूरतों

और जस्बातों के छौंक 

लगे हैं इनमें.

नए रिश्ते शायद

इसीलिए

थोड़े कच्चे लगते हैं.

जुबां और दिल में 

यही फर्क है

क्योंकि नए रिश्ते

हम फिर भी चखते हैं.

Saturday, September 10, 2022

मुस्तकबिल

 पढ़ा था नुजूम ने 

जो हाल-ए-दिल तेरा  

रू-ब-रू है तेरे

वो मुस्तकबिल तेरा

कायनात ने कर दिए

जो इंतज़ाम हैं

मेरे कारवाँ में नाम  अब

है शामिल तेरा 


Thursday, September 8, 2022

कुरबतों के लच्छे

ये मुख्तलिफ सी डोर हैं गाठें हज़ार हैं

कुछ महज़ सूत के कुछ  रेशम के तार हैं 

उलझे भी हैं, सुलझे भी ये कुरबतों के लच्छे  

हर रंग में डूबी हुई  कशिश का सार हैं


एक सिरे पे मैं खड़ा कुछ दूरी पे तू  

डोरियों में मैं फंसा  मजबूरी में तू  

ये डोरियों का बंधन महीन और महका सा है 

तेरे इत्र में मैं रमा कस्तूरी में तू  

 

महके हुए नशे में एक दूजे को थाम

रेशमी डोरियों से बुन रहे मकाम 

दिल पतंगा हो गया शम्मा को चाहता है 

चाहत को अफ़साने का दे देंगे अंजाम