Tuesday, August 18, 2020

नई शुरुआतें

देर सवेर मुलाक़ात तो होगी

तकल्लुफ सही, पर बात तो होगी

मोहल्ला वही, ये रिश्ते वही

फिर से सही, शुरुआत तो होगी


Saturday, August 15, 2020

तजुर्बों के तोहफे

 तजुर्बों के ये तोहफे 

पेश हुए हर साल 

जद्दोजहद की शिकन

तो कभी सफ़ेद बाल


रिश्तों की फुलझड़ियाँ 

हसीं लम्हों की कड़ियाँ 

फ़तेह मुसीबतों की 

शिकस्त मुहब्बत्तों की  

जश्न कामियाबी का

नाकामी पे मलाल

तजुर्बों के ये तोहफे 

पेश हुए हर साल 


 

यारों संग अय्याशियां 

ज़माने की बदमाशियां 

अहसासों में मनमुटाव

जिस्म की चोटें, दिल पे घाव

ग़मों की खामोश चुभन 

उल्फतों का उबाल

तजुर्बों के ये तोहफे 

पेश हुए हर साल


हैसियतों की लिए जंग 

आवारगी का अपना रंग

गलत सही के चौराहे

अहम् फैसले मनचाहे 

ज़िन्दगी की शतरंज में

जोखिम भरी वो चाल

तजुर्बों के ये तोहफे 

पेश हुए हर साल


Wednesday, July 22, 2020

इंतेखाब

बहुत कुछ कह जाती है ज़िन्दगी हमसे 
सुनो तो शायरी है, न सुनो तो शोर 

पेचीदा हैं ये रिश्तों के रस्म-ओ-रिवाज़ 
निभाओ तो ज़ंजीर है, निबटाओ तो डोर 

इंतज़ार की रातों का अंत होगा ज़रूर 
शुबहा से टूटें ख्वाब, उम्मीद रहे तो भोर 

इज़हार-ए-मुहब्बत करें भी तो कैसे 
कह दें तो जोरा जोरी, न कहें ...कमज़ोर 

बहुत कुछ कह जाती है ज़िन्दगी हमसे 
सुनो तो शायरी है, न सुनो तो शोर 
    

Tuesday, June 9, 2020

ग़ज़ब


रातों के अंधेरों का 
कुछ तो सबब ज़रूर होगा

ग़मगीन इस माहौल में
कहीं रब ज़रूर होगा

तू नहीं तुझ पर शायरी 
में मसरूफ हो रहे हैं

इस तंहाई के सेहर में
कुछ ग़ज़ब ज़रूर होगा

Saturday, May 30, 2020

चिलमनों से बदलते रिश्ते

हुआ करता था मेरा चिलमनों से बैर 
तेरे जलवों पे उनका पहरा जो था 

अब दौर-ए-कोरोना है
एहतियातों की बारिश है
दूर से ही मिलना है
ये चिलमनों की साज़िश है

कर ली दोस्ती उन पर्दों से 
उन पर्दों पे तेरा चेहरा जो था

Tuesday, April 28, 2020

करोना-क़ैद

ये दौर-ए-हालात हैं अजीब-ओ-गरीब से 
के अपनों को देखा कुछ ज़्यादा करीब से

जस्बातों की चादर में सलवट भी देखी
रिश्तों की नींद में करवट भी देखी

उम्मीदों के आँगन में दीवार भी थी
और प्यार के दरिया में दरार भी थी

दुखती हुई नव्ज़ को खामोश भी देखा
अनकहे अलफ़ाज़ का रोष भी देखा

देखा कई अरमां नज़रअंदाज़ थे
और कई आम मुद्दे छुपे राज़ थे

ये मन मुटाव के बादल सालों घिरते रहे 
हम मसरूफियत की चादर ओढ़े फिरते रहे 

जब हुए करोना-क़ैद घर में नसीब से
अपनों को देखा कुछ ज़्यादा करीब से 

Tuesday, April 14, 2020

शीशों की दीवार

रोशिनी मेरे कमरे 
में कम तो नहीं है
तेरी परछाइयों का ज़ालिम
पर ये सितम तो नहीं है 
मन टटोलता है
दूरियों के अँधेरे
कुछ लम्हों की मशाल
भी हाथ में है मेरे
गुफ्तगू की चिंगारियां 
ख़यालों में झूमती हैं
दीवानगी की जुगनी  
बंद घर में घूमती है 
ये घर भी कुछ अजीब है
के शीशों की दीवार है
घर में बहुत अज़ीज़ हैं
तू है, मगर उस पार है।