Friday, November 4, 2016

आज कल मेरे ख्वाब...

आज सूरज चाँद सा क्यूँ लग रहा है?
इंसान शायद रात को ज़यादा जग रहा है
धूप में गर्माहट नहीं, रोशिनी भी नम है
आज कल दिनों में शराफ़ते भी कम है
धुआं सा उठ रहा है, जाने क्या जल रहा है
हैवान राख चिताओं की माथे पे मल रहा है

खामखां दुनिया की फ़िक्रों को सोख्ते हैं
ख्वाब मेरे ऐसे ...नींदों को चोंकते हैं

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