इश्क़ फासलों का मोहताज न हो जाये
ये आशिक़ तन्हाई से नाराज़ न हो जाये
दूरियों का बहाना तो पुराना है मेरी जान
इस का अहसास मुझे आज न हो जाये
हम तो खतों में रूमानी हो चले हैं
न मिलना मगर तेरा अंदाज़ न हो जाये
तेरी शान में बुनते हैं काफियों के काफिले
तेरी बेरुखी से कड़वे मेरे अलफ़ाज़ न हो जाएं
बीमार हूँ तेरे हुस्न का, ए हूर की परी
नामौजूदगी तेरी मेरा इलाज न हो जाये
इश्क़ फासलों का मोहताज न हो जाये
ये आशिक़ तन्हाई से नाराज़ न हो जाये
No comments:
Post a Comment