Wednesday, November 23, 2016

कुछ ख़ास नहीं

कुछ कहना है तुम्हें
मगर कुछ ख़ास नहीं
यूहीं ख़यालों में मुस्कुराती हो
सपनों में आती जाती हो
कई जस्बात जगाती हो
जिनके लिए अलफ़ाज़ नहीं
कुछ कहना है तुम्हें
मगर कुछ ख़ास नहीं
टूटी फूटी यादें भी हैं
सपने रंगीन कुछ सादे भी हैं
कुछ मंज़िलों के इरादे भी हैं
कुछ दूर सही, कुछ पास नहीं
कुछ कहना है तुमसे
मगर कुछ ख़ास नहीं
चाहत भी है, सुकून भी है
शायरी में मेरा कुछ खून भी है
ठहराव भी है और जुनून भी है
शायद तुम्हे एहसास नहीं
कुछ कहना है तुम्हें
मगर कुछ ख़ास नहीं

No comments:

Post a Comment