shayadshayar
Saturday, April 15, 2017
कनखियाँ
ये कनखियों के इशारे हैं क्या?
ये मुस्कानों के लश्कारे हैं क्या?
तू दूर से ही कर देगी घायल हमें
हम इतने किस्मत के मारे हैं क्या?
Monday, March 13, 2017
होली मुबारक समृद्धि
भोली है निकली है घर से
होली है दुबकी नहीं डर से
दरिंदा है छेड़ेगा खामखां में
परिंदा है
वो
दिल आसमाँ में
डरेगी नहीं वो गलत ताकतों से
मरेगी नहीं उसकी चाह आफतों से
ख़ौफ़ज़दा हूँ खतरों का ज़िक्र तो करूंगा
एक पिता हूँ हर लम्हा फ़िक्र तो करूंगा
टोकूंगा नहीं सबक़ है इस किस्से में
रोकूंगा नहीं रंग
सभी
हैँ तेरे हिस्से में
Wednesday, March 8, 2017
एक दिन की खैरात: Women's Day
बराबरी की जंग तू लड़ना मत
इस मायाजाल में तू पड़ना मत
तेरा वजूद आज़ाद है
कुछ भी कर गुजरने को
मर्दानी शख्सियत में सिकुड़ना मत
तेरा दिन किसी का ग़ुलाम नहीं
तेरी ख्वाहिशें बिलकुल आम नहीं
तय कर तू क्या होगी पहचान तेरी
खुद ज़नाना अंदाज़ों को जकड़ना मत
मर्दानी शख्सियत में सिकुड़ना मत
एक दिन की खैरात मत करना क़ुबूल
तेरी बुलंदी का रहे बस एक उसूल
हर दिन है तेरा, हर रात भी तेरी
इस हक़ के आग़ाज़ से बिछड़ना मत
मर्दानी शख्सियत में सिकुड़ना मत
Thursday, February 23, 2017
सुहाग रात
एक तबस्सुम का सुराग था
तेरे हुस्न का चिराग था
लिबाजों की लाली में छुपा
कितना हसीं राग था
अदाओं के ख़ज़ाने से
आँखों के मैखाने से
सुरूर का धुंआ उठा
होठों के सुलग जाने से
करिश्मा लाल रंग का था
या तेरी जवां उमंग का था
नाच उठी वो लालिमा
वो जश्न हमारे संग का था
Saturday, January 28, 2017
नयी जवानी
ताज़ी हवा का अंदाज़ हो तुम
खूबसूरत सा एक राज़ हो तुम
वो नज़र, वो हंसी, वो अल्हड़पन
एक नयी जवानी का आघाज़ हो तुम
Wednesday, January 25, 2017
आधी गड्डी
ताश की आधी गड्डी हमने
फैंट फैंट के बाटी है
प्यार मुहब्बत शक़ और झगड़ा
सब झेल के काटी है
चिड़ी के पत्ते कभी बटे
और कभी पान की बारी थी
गुससे में भी तू मुझको
लगती बहुत ही प्यारी थी
बेगम बादशाह साथ बटे
तो कभी हिससे आया गुलाम
ईंटों से बचने के लिए
हर हुकुम को मैंने किया सलाम!
आधी गड्डी और पड़ी है
और दो जोकर भी तो हैं
माना के ज़ाया उम्र हुई पर
कुछ पाते खोकर भी तो हैं!!
नए रिश्ते निभाने नहीं आते
नए रिश्ते निभाने नहीं आते
कुछ सपने भुलाने नहीं आते
पुरानी यादों की गुल्लक तोड़ कर देखी
अब वो सिक्के चलाने नहीं आते
कई मोड़ हमने मोड़ कर देखे
टूटे दिलों को फिर जोड़ कर देखे
ढूँढ़ते रहे बहाने नयी शुरुआतों के
भूलने के बहाने नहीं आते
नए रिश्ते निभाने नहीं आते
तू खफा है तो ये तेरा हक़ है
मैं मुल्ज़िम हूँ पर ये फ़रक़ है
दुनिया छिपा लेती है जज़्बात अपने
मुझे दर्द छिपाने नहीं आते
नए रिश्ते निभाने नहीं आते
रहम कर पकड़ ले हाथ मेरे
कुछ दूर तो चल ले साथ मेरे
कुछ लिख ही दूंगा उसको देख तुझ में
गैरों पे शेर सुनाने नहीं आते
नए रिश्ते निभाने नहीं आते
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