Tuesday, April 14, 2020

शीशों की दीवार

रोशिनी मेरे कमरे 
में कम तो नहीं है
तेरी परछाइयों का ज़ालिम
पर ये सितम तो नहीं है 
मन टटोलता है
दूरियों के अँधेरे
कुछ लम्हों की मशाल
भी हाथ में है मेरे
गुफ्तगू की चिंगारियां 
ख़यालों में झूमती हैं
दीवानगी की जुगनी  
बंद घर में घूमती है 
ये घर भी कुछ अजीब है
के शीशों की दीवार है
घर में बहुत अज़ीज़ हैं
तू है, मगर उस पार है।

Wednesday, April 1, 2020

ज़हर


कैसा ये दौर है कैसा ये शहर है?
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

ज़मीन तो खुश है आसमान चहकता है
जंगल जवां है बाग़ फिर महकता है
दरियाओं  में भी उमंग की लहर है
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

छाती फैलाकर  दरख़्त तो बुलंद हैं
इंसानी इरादों का कारखाना बंद है
वक़्त की चाल में कैसा ये पहर है
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

तितली नाचती है भवरा गुनगुनाता है
यार दूर रहते हैं मोर छत पे आता है
जुगनू की रात है परिंदों की सहर है
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

ख्वाहिश पे ताला  मंसूबों की हड़ताल  
ताकतों की शिकस्त कीटाणु का कमाल 
सवाल पूछते हैं मंथन है या कहर है
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

ज़हर हज़म कर या उगल दे बहार
कुदरत को दोष दे या खुद कर इकरार   
तेरी करतूतों की तुझ पर ही मेहर है
कैसा ये दौर हैcकैसा ये शहर है 
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

Sunday, March 1, 2020

कुछ नए मकाम



चलो जवानी से पीछा छूटा
अब काम के काम हो जाएं 
नोन तेल लकड़ी के आगे 
कुछ नए मकाम हो जाएं

फिकरों के हिसाब लगाकर
जोड़, घटा और भाग गुना कर 
वसीहतों पे नाम चढ़ाकर 
हम खुद अपने नाम हो जाएं 
अब काम के काम हो जाएं

जलवों के अरमानों से हटकर
हुस्न के रेशम जाल झटक कर
रिश्तों की गहराई समझकर
गहराई का अंजाम हो जाएं
अब काम के काम हो जाएं

दुनियादारी से न तोल कर
शौकों की गुल्लकें खोल कर
बस शौकीनों का ही मोल कर
उनमें ही नीलाम हो जाएं
अब काम के काम हो जाएं

एक और हकीकत है, जानकर
मायाजाल को हैरान कर
रूहानी सच्चाई  मानकर
उस सच में ही तमाम हो जाएं 
चलो जवानी से पीछा छूटाें
अब काम के काम हो जाएं 
नोन तेल लकड़ी के आगे 
कुछ नए मकाम हो जाएं

Friday, December 6, 2019

आशिक़ तेरी मजबूरी

आशिक़ों की ये मजबूरी है एक जिगर में दर्द ज़रूरी है तेरे इंतज़ार में कहीं साकी है अभी इश्क़ पे शायरी बाकी है तू खुश है तो दास्ताँ अधूरी है

Monday, September 9, 2019

सिरहाना

रातों में कुछ तूफ़ान सा है
अँधेरा भी अनजान सा है
उमंगें कुछ मजबूर भी हैं
तारों की लौ कुछ दूर ही है
अमावस का वास चमन में है 
मेरा चाँद कोप भवन में है
दिल खाली आसमान सा है
एक सिरहाना सुनसान सा है 

ये कैसा रेगिस्तान सा है
सुकून यहाँ मेहमान सा है
रेतों के सरकते पाओं के
बवंडर हैं शंकाओं के
प्यासों का कोई ख्वाब है ये
चश्मा है या सराब है ये?
वो है तो नख्लिस्तान सा है
एक सिरहाना सुनसान सा है

ये कमरा बेज़ुबान सा है 
क़ैदख़ाना बेईमान सा है
यादों के कंकाल यहां
नींदों के हैं आकाल यहां
साँसों में टीस कहारों की
घुटन यहां दीवारों की
वो चेहरा रोशनदान सा है
एक सिरहाना सुनसान सा है

Saturday, June 1, 2019

शराब की तहकीकात

चला ज़िक्र तो हमने भी बात की 
यादों के धुंदले में खोई हुई रात की .

सुरूर ढून्ढ लेता है दर्द के ठिकानो को 
आज फिर इस शराब ने तहकीकात की.

बिन बुलाये मेहमान की तरह यारों 
आसुओं ने चेहरे पे बरसात की.

कहते हैं की वक़्त हर घाव भर देता है 
आस कब तक रखूँ  इस करामात की.

खून से तुझपर लिखता हूँ शायरी संजीव
कदर  नहीं तुझे क्या इस कीमती दवात की?

चला ज़िक्र तो हमने भी बात की 
यादों के धुंदले में खोई हुई रात की .

रुक जाता है

कभी  सोचता है होठों को तेरे 
छु ले मगर रुक जाता है
रुका न जो तीर-ओ-खंजर से
खा वार-ए-नज़र रुक जाता है
ढूंढ़ता फिरता है सुकून मुसाफिर जो 
पहुंचके तेरे घर रुक जाता है 
दिन के कारवां में झलक तेरी 
दिख जाये तो सफर रुक जाता है 
कभी  सोचता है होठों को तेरे 
छु ले मगर रुक जाता है