रातों के अंधेरों का कुछ तो सबब ज़रूर होगा ग़मगीन इस माहौल में कहीं रब ज़रूर होगा तू नहीं तुझ पर शायरी में मसरूफ हो रहे हैं इस तंहाई के सेहर में कुछ ग़ज़ब ज़रूर होगा
हुआ करता था मेरा चिलमनों से बैर तेरे जलवों पे उनका पहरा जो था अब दौर-ए-कोरोना है एहतियातों की बारिश है दूर से ही मिलना है ये चिलमनों की साज़िश है कर ली दोस्ती उन पर्दों से उन पर्दों पे तेरा चेहरा जो था
ये दौर-ए-हालात हैं अजीब-ओ-गरीब से के अपनों को देखा कुछ ज़्यादा करीब से जस्बातों की चादर में सलवट भी देखी रिश्तों की नींद में करवट भी देखी उम्मीदों के आँगन में दीवार भी थी और प्यार के दरिया में दरार भी थी दुखती हुई नव्ज़ को खामोश भी देखा अनकहे अलफ़ाज़ का रोष भी देखा देखा कई अरमां नज़रअंदाज़ थे और कई आम मुद्दे छुपे राज़ थे ये मन मुटाव के बादल सालों घिरते रहे हम मसरूफियत की चादर ओढ़े फिरते रहे जब हुए करोना-क़ैद घर में नसीब से अपनों को देखा कुछ ज़्यादा करीब से
रोशिनी मेरे कमरे में कम तो नहीं है तेरी परछाइयों का ज़ालिम पर ये सितम तो नहीं है मन टटोलता है दूरियों के अँधेरे कुछ लम्हों की मशाल भी हाथ में है मेरे गुफ्तगू की चिंगारियां ख़यालों में झूमती हैं दीवानगी की जुगनी बंद घर में घूमती है ये घर भी कुछ अजीब है के शीशों की दीवार है घर में बहुत अज़ीज़ हैं तू है, मगर उस पार है।
कैसा ये दौर है कैसा ये शहर है? हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है ज़मीन तो खुश है आसमान चहकता है जंगल जवां है बाग़ फिर महकता है दरियाओं में भी उमंग की लहर है हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है
छाती फैलाकर दरख़्त तो बुलंद हैं इंसानी इरादों का कारखाना बंद है वक़्त की चाल में कैसा ये पहर है हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है तितली नाचती है भवरा गुनगुनाता है यार दूर रहते हैं मोर छत पे आता है जुगनू की रात है परिंदों की सहर है हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है ख्वाहिश पे ताला मंसूबों की हड़ताल ताकतों की शिकस्त कीटाणु का कमाल सवाल पूछते हैं मंथन है या कहर है हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है ज़हर हज़म कर या उगल दे बहार कुदरत को दोष दे या खुद कर इकरार तेरी करतूतों की तुझ पर ही मेहर है कैसा ये दौर हैcकैसा ये शहर है हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है