Tuesday, December 9, 2025

इश्कबाज़ी ishshakkbaazi

 ये ज़माना क्या जाने की 

आतिशबाज़ी क्या होती है

पंद्रह साल पुरानी होकर 

उल्फत ताज़ी क्या होती है

अल्हड़पन की ख्वाहिश को

पकी उम्र में पाया जो

तब जाना के दिल हरवाके

जीती बाज़ी क्या होती है 

इतने बरसों की दूरी से

हालातों की मजबूरी से

लगा निशाना तो जाना के

तीरंदाज़ी क्या होती है

जश्न-ऐ-मुशाबरत मनाके

जिस्मों की वो प्यास मिटाके

पहली बार एहसास किया के

खुश-मिजाज़ी क्या होती है

अर्सों पहले शेर सुनाके 

जवां हुस्न का दिल फुसलाके 

हमराज़ों को जता दिया के 

दूर-अंदाज़ी क्या होती है

आशिक़ हूँ मैं ये माना है 

इश्क़ तेरा एक पैमाना है

इसको पा के पता लगा 

के इश्कबाज़ी क्या होती है!

Monday, December 8, 2025

हकीकत नहीं haqeeqat nahin

बस मिलती है ज़िल्लत, अक़ीदत नहीं

भयानक बला है, गनीमत नहीं 

पर आशिक़ से पूछो तो बोलेगा वो 

मुहब्बत है जन्नत, मुसीबत नहीं


तू आशिक़ नहीं तो तू समझेगा क्या 

इस मजमे में तेरी शरीकत नहीं 


बेमानी है जीना मुहब्बत बिना 

ऐ दोस्त, ये मेरी नसीहत नहीं 


हुस्न वालों को उसने बनाया है खूब

सूरत तो दी है पर सीरत नहीं 


है हुनर, मैं परखता हूँ हीरों को 

दुनिया में आशिक़ की कीमत नहीं 


मशहूर कसीदे मोहब्बत के हैं 

हैं किस्से कहानी -- हकीकत नहीं 

Friday, November 14, 2025

हो नहीं सकता ho nahin sakta

जो शिद्दत से किया था इश्क़ 

दोबारा हो नहीं सकता

के इसके एवज़ दौलत का

तिजारा हो नहीं सकता 


खंजर पीठ पर जिनने 

भोंका है वो हाथों में

मेरा तो दिल ये कहता है

तुम्हारा हो नहीं सकता 


तेरी चाहत को परखे बिन

गुज़ारा जिस ने भी जीवन

उससे ज़्यादा तो किस्मत

का मारा हो नहीं सकता


तू जो आये महफ़िल में 

तुझे कोई और न देखे

जो देखे तो मुझे वो शक़्स 

गवारा हो नहीं सकता 


मीठा लहजा है उसका

जुबां भी उसकी मीठी है

ऐ दरियादिल तेरा पानी

तो खारा हो नहीं सकता


तू मेरे रु-बा-रु भी हो

तेरी आँखों में झाँकू मैं

ख़ुशनुम्मा इससे ज़्यादा

नज़ारा हो नहीं सकता

Tuesday, October 21, 2025

सिलसिला silsila

 हम क्यों ज़िन्दगी से गिला करते हैं

खामखां उस शक़्स से मिला करते हैं

भूल जाओ वो हारी हुई बाज़ी को  

शुरू एक नया सिलसिला करते हैं 


Sunday, August 10, 2025

वो बहुत दूर चला गया vo bahut door chala gaya

बढ़ गए हैं फासले कशिश बुलंद रही

तेरी बेरुखी भी हमको पसंद रही 


बस इस उम्मीद पर ही के तू खाब में दिखे

रत जगे किये थे पर आँखें बंद रहीं 


बेशुमार हैं सितम तूने जो थे किये 

हसीं लम्हों की याद मेरे पास चंद रहीं 


शर्तें वो प्यार की मंज़ूर न थी तुझको

चाहत मेरी हर शर्त से रज़ामंद रही 


सुलग रहा था मैं जब उल्फत की आग में 

तेरी तरफ से लौ थोड़ी मंद मंद रही 

Tuesday, July 15, 2025

शायर की उम्मीद shayar ki ummeed

ऐलान ऐ मुहब्बत का वादा नहीं है

वो दिल जीतने पे अमादा नहीं है

मेहबूबा  पे वो जां छिड़कने है आया

कुछ पाने का उसका इरादा नहीं है


अधूरी रहेगी ये दास्ताँ ऐ उल्फत   

पर इश्क़ ये हरगिज़ भी आधा नहीं है


बेवफाई का रास्ता है टेढ़ा मेढ़ा

और वफ़ा का भी सीदा सादा नहीं है 


सियासत के ठेकेदारों का रुतबा 

दौलत और दम है, मर्यादा नहीं है 


बिसात के आखिरी घर पे जो अदना है

चालों का राजा है, वो प्यादा नहीं है


वाह वाही की गूँजें, ये तालियों का शोर

शायर की उम्मीद इससे ज़्यादा नहीं है 


Saturday, June 21, 2025

मुजस्समा mujassamma

मुजस्समा खुद का मैंने ख्यालों में तराशा है

मुकम्मल है जो ख़्वाबों में, हकीकत में हताशा है 

मुझे न मिल सका वो शक़्स जो हर पहलू से उम्दा हो 

हज़ारों आइनों में मैंने उसी को ही तलाशा है 


तेरी शिद्दत, तेरी फितरत, तेरा जज़्बा ही सब कुछ है

हुस्न तेरा, अदा तेरी, ये जलवा तो तमाशा है


बस एक वो बात है मुझ में ज़माने से जो ऊपर है

मुझे तेरी ही रग रग से मुहब्बत बेतहाशा है 


हैवानों से क्या बोलें वो कड़वाहट ही चखते हैं 

वो क्या जानें के मीठापन तो चाहत का बताशा है  


मुक्तलिफ़ ज़ुबानों से ये दुनिया बट गयी ऐसे 

आशिकाना शायरी ही जुड़वाने की भाषा है