Wednesday, May 15, 2019

सपने

मैने सपने ज़मीन पर रेंगते देखे हैं 
न्हे ऊंचाइयों से गिराया है किसने?
ज़िन्दगी फिर भी दौड़ती फिरती है 
इसे अंजाम तक पहुँचाया है किसने?
ऊंचाइयां यहीं हैंसपने यहीं हैं
अपने दिल को आइना दिखाया है किसने?

कुदरत

बादल
बादलों ने कहाँ मंज़िलें तलाशी हैं
सफर में फना होना फितरत है इनकी

हवा
हवा तो मनचली है, यकायक रुख बदलती है
एक हम ही हैं जो रास्तों के मोहताज हैं

ओस और धूप
ओस और धूप का मन मुटाव मिटाना नहीं आता
चाहते तो हम भी हैं कौस-ओ-कज़ाह का जलवा

वक़्त की सुरंग

वक़्त की सुरंग में
गुंजाइश नहीं है रुकने की
गुज़रते लम्हों के पाँव 
मुझे कुचल के जाते हैं

तुम खड़े रहना 
अपनी बाहें फैलाए
मैं न सही मेरे ख़याल
वहीँ डेरा जमाते हैं

मेरी ख्वाहिशों से कहीं आगे 
निकल गयी यह उम्र
अब इन फासलों से ही सही
पर हम इश्क़ खूब निभाते हैं


Sunday, May 5, 2019

गर्म हवाएं

किसी रेगिस्तान पे रेंगती हुई
चली आती हैं गर्म हवाएं
सर पटकती हैं मेरे एयर कंडिशन्ड 
कमरों की खिड़कियों पर
नाचती हैं धूल के संग 
खाली मैदानों पे
एक ज़माना था खस की टाटों पे
प्यास बुझा लेती थी अपनी
दरख्तों की हरियाली में सुस्ता कर
कर लेतीं थी अपना गुस्सा ठंडा
अब ये गुस्सा मुझ पर बरसता है
कुदरत से बैर कर मैं
कुछ कमज़ोर हो गया हूँ
और वो आज हो गयीं मुझपे हावी. 

Monday, April 1, 2019

फुर्सत


खामोशियों के मजमे
तेरा नाम चीखते हैं
तन्हाइयों के चेहरे
तेरी अदा सीखते हैं
ये ख्वाब भी कम्बख्त
तेरी गली में घूमते हैं
और चैन के सन्नाटे
तेरी धुन में झूमते हैं
न जाने क्यों फुर्सत से
कुछ डर सा लग रहा है 
मसरूफियत में डूबकर
दिल खुद को ठग रहा है

Sunday, December 16, 2018

पिंजरा


पिंजरे में रात दिन फड़फड़ाती हैं
क़ैद में ये कितना करहाती हैं! 
खोल दिया पिंजरा तो उड़ जाएँगी कहीं
दर्द भरी यादें फिर सताएंगी नहीं 
तू पिंजरा खोलने से क्यों घबराती है?

लापता वक़्त

दबे सुरों में ग़ज़ल
गुनगुनाने लगा हूँ मैं
ज़िन्दगी से कुछ लम्हे
चुराने लगा हूँ मैं
लापता है वो वक़्त
ज़माने की नज़र में
तेरे साथ में जो तन्हा
बिताने लगा हूँ मैं