Wednesday, February 24, 2021

मंदिर


मंदिर 

अंतर्मन के मंदिर को
भौतिकता से जोड़ दिया
और बर्बरता के खँडहर को
बर्बरता से तोड़ दिया

एक विशाल जनमानस को
निद्रा से झकझोर दिया
अति नम्र मानवता को
नाश के मुख से मोड़ दिया

इतिहास के भावी पन्नो से
हास्य रस निचोड़ दिया
झूट के साहूकारों के
कथनों ने कफ़न ओढ़ लिया

अन्धकार की सदियों को
एक नया उदय और भोर दिया
कड़वे कोलाहल से कोमल
शंकों का पावन शोर दिया

बहुरंगी इस धरती पर
केसर को थोड़ा ज़ोर दिया
और कच्चे रंग सा जो बहता था
उस केसर ने बहना छोड़ दिया

अंतर्मन के मंदिर को
भौतिकता से जोड़ दिया
और बर्बरता के खँडहर को
बर्बरता से तोड़ दिया

मसरूफ़ियत की ढाल

 

ये कैसे दुश्मनी है

मेरी मेरे ख्यालों से

मुहब्बतों में उलझे

अनकहे सवालों से

अक्सर रातें जाग कर 

ख़्वाबों से जूझती है

रोज़ अकेलेपन में ये

हाल-ए-दिल पूछती हैं

ये शतरंज की बिसात है 

अजीब-ओ-गरीब जंग है

मोहरे स्याह सफ़ेद हैं

चालों का और ही रंग है

हमला सब तरफ से है

तलवार कहीं तो भाल है

घायल हुआ ख्यालों से  

मसरूफ़ियत ही ढाल है


Sunday, December 13, 2020

नींद की कचेहरी


 नींद की कचेहरी में

मुकद्दमा किया अपनों ने  

कटघरे में दिल था मेरा 

और बयान दिया सपनों ने  


कई पैने सवाल किये 

ख़्वाबों को टटोला गया

ज़हन में छुपे हर राज़ को

बेरहमी से खोला गया


ख़्वाबों की तो ये फितरत थी 

मनचाहा सच भुना गए 

पर खुदा को नाज़िर मानकर

ये दिल का हाल सुना गए 


वकील भी इतने शातिर थे

बस यूं करीं तहक़ीक़ातें 

जो महज़ हसीं ख्याल ही थे

बन गयीं असल वारदातें


मुंसिफ था रिश्तों का कायल 

दिल को मुल्ज़िम करार किया 

दिल क़ैद किया बस रिश्तों में 

सब ख़्वाबों को तड़ी-पार किया 


मसरूफ बेमानी कामों में 

मैं जस्बातों से डरता हूँ 

ख्वाब न आएं आँखों में तो 

नींद से परहेज़ भी करता हूँ


Monday, November 16, 2020

वाह वाही


 उजालों के मजमे रहनुमाई नहीं देते 

दिवाली में अँधेरे दिखाई नहीं देते


हर लौ महज़ रोशन उजाले  नहीं करती

परवानों के मातम हैं, सुनाई नहीं देते 


अर्सों से हमें मर्ज़-ए-मोहब्बत की सज़ा है  

चारागर तुम ही हो, दवाई नहीं देते 


सब कुछ जो लुटा देते थे शायर की कलम पर

इस दौर में दो बूँद तक स्याही नहीं देते


ज़माना मेरे शेरों को सुनने चला आये

एक तुम ही हो जो वाह वाही नहीं देते


उजालों के मजमे रहनुमाई नहीं देते 

दिवाली में अँधेरे दिखाई नहीं देते


Sunday, October 18, 2020

ज़िन्दगी आईने में दिखती फरक है

ज़िन्दगी आईने में दिखती फरक है

हर मंज़िल की थोड़ी मंदी सी चमक है

टेढ़े मेढ़े रस्तों से जो गुज़रे हैं हम

जवानी में लगता था सीधी सड़क है


हर मोड़ पे कई चेहरे अनजान मिले 

कुछ मेहरबान मिले, कुछ बेईमान मिले

जब हमसफ़र बने तो पता न चला

ये संगत का असर है बुरा या भला

तजुर्बों से सीखा नया एक सबक है

ज़िन्दगी आईने में दिखती फरक है  


खूब रफ़्तार से मुहब्बत करके भी देखी

मस्त हवाओं में उड़ान भरके भी देखी

पथरीले वो मंज़र, हवाओं के झोंके

वो गिरना संभालना और नज़रों के धोखे 

सख्त दिल ये ज़मीन और बेरहम फलक है

ज़िन्दगी आईने में दिखती फरक है  

  

मुड़कर जो देखें तो बुरा हाल तो होगा

मौके जो चूके, उनपर मलाल तो होगा 

वक़्त जाया कर जब भी सराहे नज़ारे 

किसी हमसफ़र संग गिने थे सितारे

वही पल में हसीं यादों की झलक है

ज़िन्दगी आईने में दिखती फरक है  

  

लम्हे थे जो जमकर जी लिए मैंने 

अब परदे आईनों पे सी दिए मैंने

नज़र सामने है, और सीधी ही है सड़क

मोड़ आएं तो आएं, चलूँगा बेधड़क

वो जीना क्या जो हर कदम पे हिचक है

ज़िन्दगी आईने में दिखती फरक है


 ज़िन्दगी आईने में दिखती फरक है

हर मंज़िल की थोड़ी मंदी सी चमक है

टेढ़े मेढ़े रस्तों से जो गुज़रे हैं हम

जवानी में लगता था सीधी सड़क है


Friday, October 2, 2020

हसीनों से दिल तो लगाना पड़ेगा


हसीनों से दिल तो लगाना पड़ेगा

शायर हूँ, ये जोखिम उठाना पड़ेगा


इश्क़ का इत्तर लव्ज़ों में तोलकर  

काफियों में खयालात बोलकर

हालात-ए-जिगर तो सुनाना पड़ेगा

शायर हूँ, ये जोखिम उठाना पड़ेगा


मुखड़े की रौनक मुखड़े में  डाल

अंतरे में लिखूं मैं दिल का हाल

नज़ाकत से उनको लुभाना पड़ेगा

शायर हूँ, ये जोखिम उठाना पड़ेगा


मुद्दे तो हैं चुनने को मगर 

श्रोता तो हों सुनने को इधर! 

रोज़गार मुझे भी कमाना पड़ेगा

शायर हूँ, ये जोखिम उठाना पड़ेगा


हसीनों से दिल तो लगाना पड़ेगा 

शायर हूँ, ये जोखिम उठाना पड़ेगा


Saturday, September 19, 2020

आईने से मुहब्बत

 

आईने से मुहब्बत इतनी न करो

ज़ालिमाना ये हरकत इतनी न करो

आईनों की तारीफें अच्छी हैं मगर

हम शायरों की ज़िल्लत इतनी न करो 


हाँ वाजिब है तेरी ज़ुल्फ़ों का इतराना

बिना लव्ज़ों के पूरी ग़ज़ल कह जाना

शेर कुछ हम कहें इसका मौका भी तो दो 

खुद अपने से ही उल्फत इतनी न करो  

हम शायरों की ज़िल्लत इतनी न करो 


सेल्फी में वो तबस्सुम केहर ढाती है

कभी कभी वो तस्वीर नज़र आती है 

हम आशिक़ तस्वीर से कर लेंगे गुज़ारा

तुम तस्वीरों में किल्लत इतनी न करो

हम शायरों की ज़िल्लत इतनी न करो 


ज़ुल्मों को तेरे देख रही है खुदाई 

मिसाल बन रही है तेरी बेपरवाही 

नज़र में खुदा की ये हिमाकत होगी

इसलिए ये हिमाकत इतनी न करो 

हम शायरों की ज़िल्लत इतनी न करो