Saturday, October 29, 2022

फुलझड़ी

 


जिस नादान को दो वक़्त की रोटी नसीब न थी

 वो खैरात में मिली फुलझड़ी का क्या करेगा?

 सोचा तो यही था मैंने... पर उसकी मुस्कान देख कर

 लगा की ख़ुशी तो बहाना ढूंढ़ती है दिल में घर करने का

कच्चे रिश्ते

 गुज़रते वक़्त ने 

हलकी आंच की तरह

रिश्तों को सेका है.

आपसी ज़रूरतों

और जस्बातों के छौंक 

लगे हैं इनमें.

नए रिश्ते शायद

इसीलिए

थोड़े कच्चे लगते हैं.

जुबां और दिल में 

यही फर्क है

क्योंकि नए रिश्ते

हम फिर भी चखते हैं.

Saturday, September 10, 2022

मुस्तकबिल

 पढ़ा था नुजूम ने 

जो हाल-ए-दिल तेरा  

रू-ब-रू है तेरे

वो मुस्तकबिल तेरा

कायनात ने कर दिए

जो इंतज़ाम हैं

मेरे कारवाँ में नाम  अब

है शामिल तेरा 


Thursday, September 8, 2022

कुरबतों के लच्छे

ये मुख्तलिफ सी डोर हैं गाठें हज़ार हैं

कुछ महज़ सूत के कुछ  रेशम के तार हैं 

उलझे भी हैं, सुलझे भी ये कुरबतों के लच्छे  

हर रंग में डूबी हुई  कशिश का सार हैं


एक सिरे पे मैं खड़ा कुछ दूरी पे तू  

डोरियों में मैं फंसा  मजबूरी में तू  

ये डोरियों का बंधन महीन और महका सा है 

तेरे इत्र में मैं रमा कस्तूरी में तू  

 

महके हुए नशे में एक दूजे को थाम

रेशमी डोरियों से बुन रहे मकाम 

दिल पतंगा हो गया शम्मा को चाहता है 

चाहत को अफ़साने का दे देंगे अंजाम 

Monday, June 20, 2022

मुलाकातों की खुशबू


मुलाकातों की  खुशबू में मेरे ये दिन  गुज़रते हैं

इत्तर तेरा महेकता है फक्र गुलज़ार करते हैं 

पुरानी है  वो खुशबू और वो किस्से भी पुराने हैं 

नए अलफ़ाज़ में उलझे ये शेरों में उमड़ते हैं 


चुराते हैं वो बारिश से तरी मिट्टी का सोंधापन 

तेरे अहसास के झोंके मेरी साँसों को भरते हैं 


अगरबत्ती की शिद्दत है तेरी यादों के धुंए में

के हम तो राख ही बनकर हर दिन यूं बिखरते हैं  

  

ये खुशबू ही तो ज़ालिम है हवाओं में मचलती है

मेरे तो ख्वाब इसी को ढून्ढ तरसते और निखरते हैं 


तेरी दुनियासे बिछड़े पल हैं जैसे आग में संदल 

उसी माफिक मेरे जज़्बात महक महक के मरते हैं 


मुलाकातों की खुशबू में मेरे तो दिन गुज़रते हैं

इत्तर तेरा महेकता है कई गुलज़ार संवरते हैं


Sunday, February 27, 2022

पगडण्डी

बहुत अरसे से मजमों संग 

उन्हीं की चाल, उन्हीं के ढंग 

में चौड़ी सी सड़क पे चल 

के ढूंढे ज़िन्दगी के हल


उम्मीदों की भरी मंडी

से हटकर एक वो पगडण्डी

मिली मुझको तो मैं ठहरा

सफर का था नया चेहरा


ये पगडण्डी है पतली सी

टेढ़ी मेढ़ी और मचली सी

हर कदम पे अंगड़ाई 

सफर में  मंज़िलें पाई 


मसरूफ भी हूँ, फुर्सत भी है

तनहा भी हूँ, कुर्बत भी है

उड़ जाता हूँ ख्यालों पर 

रुक जाता हूँ, दोराहों पर 


दोराहे इंतेखाब नहीं

हर लम्हे का हिसाब नहीं\

दो राहों पर भी चलता हूँ

गिरता भी हूँ फिसलता हूँ


डगरों की अब फ़ौज लगी है

हर डगर पर मौज लगी है

पगडंडियों से यारी है

और उम्र पड़ी अब सारी है


Monday, January 31, 2022

ख़ास धूप

 वो धूप थोड़ी ख़ास थी

कैसे बयां करूँ

बहुत दिनों से आस थी 

कैसे बयां करूँ

कुर्बत के एक सिरे को

पकडे खड़ा था मैं

अरसे से इसी  ज़िद्द पे

जमकर अड़ा था मैं 

आज तू भी कितने पास थी

कैसे बयां करूँ 


उमंगों की महफ़िल थी 

कैसे बयां करूँ 

अदाएं तेरी कातिल थीं 

कैसे बयां करूँ 

जज़्बातों के मज़मून 

किताबों से पढ़ दिए

तस्वीरों से वो लम्हे 

यूँ यादों में जड़ दिए 

उस टीले पे झिलमिल थी 

कैसे बयां करूँ 

 

बातों में एक रुझान था 

कैसे बयां करूँ

रूमानी आस्मान था 

कैसे बयां करूँ 

चाय के गर्म प्याले का 

नसीब देख लो 

चुस्की भी लेलो चाव से

और हाथ सेख लो 

मेरा भी वो अरमान था

कैसे बयां करूँ