Friday, November 14, 2025

हो नहीं सकता ho nahin sakta

जो शिद्दत से किया था इश्क़ 

दोबारा हो नहीं सकता

के इसके एवज़ दौलत का

तिजारा हो नहीं सकता 


खंजर पीठ पर जिनने 

भोंका है वो हाथों में

मेरा तो दिल ये कहता है

तुम्हारा हो नहीं सकता 


तेरी चाहत को परखे बिन

गुज़ारा जिस ने भी जीवन

उससे ज़्यादा तो किस्मत

का मारा हो नहीं सकता


तू जो आये महफ़िल में 

तुझे कोई और न देखे

जो देखे तो मुझे वो शक़्स 

गवारा हो नहीं सकता 


मीठा लहजा है उसका

जुबां भी उसकी मीठी है

ऐ दरियादिल तेरा पानी

तो खारा हो नहीं सकता


तू मेरे रु-बा-रु भी हो

तेरी आँखों में झाँकू मैं

ख़ुशनुम्मा इससे ज़्यादा

नज़ारा हो नहीं सकता

Tuesday, October 21, 2025

सिलसिला silsila

 हम क्यों ज़िन्दगी से गिला करते हैं

खामखां उस शक़्स से मिला करते हैं

भूल जाओ वो हारी हुई बाज़ी को  

शुरू एक नया सिलसिला करते हैं 


Sunday, August 10, 2025

वो बहुत दूर चला गया vo bahut door chala gaya

बढ़ गए हैं फासले कशिश बुलंद रही

तेरी बेरुखी भी हमको पसंद रही 


बस इस उम्मीद पर ही के तू खाब में दिखे

रत जगे किये थे पर आँखें बंद रहीं 


बेशुमार हैं सितम तूने जो थे किये 

हसीं लम्हों की याद मेरे पास चंद रहीं 


शर्तें वो प्यार की मंज़ूर न थी तुझको

चाहत मेरी हर शर्त से रज़ामंद रही 


सुलग रहा था मैं जब उल्फत की आग में 

तेरी तरफ से लौ थोड़ी मंद मंद रही 

Tuesday, July 15, 2025

शायर की उम्मीद shayar ki ummeed

ऐलान ऐ मुहब्बत का वादा नहीं है

वो दिल जीतने पे अमादा नहीं है

मेहबूबा  पे वो जां छिड़कने है आया

कुछ पाने का उसका इरादा नहीं है


अधूरी रहेगी ये दास्ताँ ऐ उल्फत   

पर इश्क़ ये हरगिज़ भी आधा नहीं है


बेवफाई का रास्ता है टेढ़ा मेढ़ा

और वफ़ा का भी सीदा सादा नहीं है 


सियासत के ठेकेदारों का रुतबा 

दौलत और दम है, मर्यादा नहीं है 


बिसात के आखिरी घर पे जो अदना है

चालों का राजा है, वो प्यादा नहीं है


वाह वाही की गूँजें, ये तालियों का शोर

शायर की उम्मीद इससे ज़्यादा नहीं है 


Saturday, June 21, 2025

मुजस्समा mujassamma

मुजस्समा खुद का मैंने ख्यालों में तराशा है

मुकम्मल है जो ख़्वाबों में, हकीकत में हताशा है 

मुझे न मिल सका वो शक़्स जो हर पहलू से उम्दा हो 

हज़ारों आइनों में मैंने उसी को ही तलाशा है 


तेरी शिद्दत, तेरी फितरत, तेरा जज़्बा ही सब कुछ है

हुस्न तेरा, अदा तेरी, ये जलवा तो तमाशा है


बस एक वो बात है मुझ में ज़माने से जो ऊपर है

मुझे तेरी ही रग रग से मुहब्बत बेतहाशा है 


हैवानों से क्या बोलें वो कड़वाहट ही चखते हैं 

वो क्या जानें के मीठापन तो चाहत का बताशा है  


मुक्तलिफ़ ज़ुबानों से ये दुनिया बट गयी ऐसे 

आशिकाना शायरी ही जुड़वाने की भाषा है 


Saturday, April 12, 2025

याद न करना yaad na karna

कभी ज़रुरत तुम्हें पड़े तो

हमारे दर को याद न करना

उजड़ रहा जो तुम्हारे गम में  

उस दिल को बर्बाद न करना

वही मुहब्बत जिसे दफन कर

आखिर अब हम संभल रहे हैं

उसी कब्र पे फूल चढ़ा कर

कोई नया फसाद न करना  

मुहब्बतों पे शेर लिखे थे

जफ़ाओं पे जो बली चढ़े हैं

महफिलों में कभी सुनो तो

मचल के फिर इरशाद न करना

बंधा के खुद को हम बेड़ियों में 

समझौतों में जो जी रहे हैं

इन बंधनों में सुकून है अब

इनसे तुम आज़ाद न करना

हुई है तुमसे जो भूल अब वो

सुधरने की गुंजाइश कम है

सुधारने का जो मन बने तो

मुआफी की फ़रियाद न करना 

कभी जो मुझसे नज़र मिले तो 

शर्म से आँखें झुकाना मत तुम

खता जो की है गिला तुम उसका

इन हरकतों के बाद न करना 


Saturday, March 22, 2025

छिड़ी हुई है जंग chidi hui hai jang

छिड़ी हुई है जंग कहीं दूर दराज़ में

बारूद और चीखें घुलें एक आवाज़ में  

पिस रहे हैं लोग याहवेह खुदा के बीच 

और दुआ मांगते हैं  शुमाह और नमाज़ में 

छिड़ी हुई है जंग कहीं दूर दराज़ में


हैं सब सियासतें तमाशाई इस कदर

के हल ढूंढ़ती हैं महज़ अलफ़ाज़ में 

छिड़ी हुई है जंग कहीं दूर दराज़ में 


हार जीत  सरहदें हैं मसला-ऐ-ज़िन्दगी 

और जान चल रही है मौत के मिज़ाज में    

छिड़ी हुई है जंग कहीं दूर दराज़ में 


शतरंज नहीं है ये इस बिसात में है खून

ऐतबार करें तो प्यादे किस चाल बाज़ में 

छिड़ी हुई है जंग कहीं दूर दराज़ में 


मंडरा रहे हैं गिद्द मुर्दों को नोचते हैं

एक और जंग छिड़ेगी चील और बाज़ में 

छिड़ी हुई है जंग कहीं दूर दराज़ में   


अब गले से लगा लो एक दुसरे का दीन

और कुछ नहीं रक्खा है इस अमन के राज़ में

छिड़ी हुई है जंग कहीं दूर दराज़ में