Wednesday, July 22, 2020

इंतेखाब

बहुत कुछ कह जाती है ज़िन्दगी हमसे 
सुनो तो शायरी है, न सुनो तो शोर 

पेचीदा हैं ये रिश्तों के रस्म-ओ-रिवाज़ 
निभाओ तो ज़ंजीर है, निबटाओ तो डोर 

इंतज़ार की रातों का अंत होगा ज़रूर 
शुबहा से टूटें ख्वाब, उम्मीद रहे तो भोर 

इज़हार-ए-मुहब्बत करें भी तो कैसे 
कह दें तो जोरा जोरी, न कहें ...कमज़ोर 

बहुत कुछ कह जाती है ज़िन्दगी हमसे 
सुनो तो शायरी है, न सुनो तो शोर 
    

Tuesday, June 9, 2020

ग़ज़ब


रातों के अंधेरों का 
कुछ तो सबब ज़रूर होगा

ग़मगीन इस माहौल में
कहीं रब ज़रूर होगा

तू नहीं तुझ पर शायरी 
में मसरूफ हो रहे हैं

इस तंहाई के सेहर में
कुछ ग़ज़ब ज़रूर होगा

Saturday, May 30, 2020

चिलमनों से बदलते रिश्ते

हुआ करता था मेरा चिलमनों से बैर 
तेरे जलवों पे उनका पहरा जो था 

अब दौर-ए-कोरोना है
एहतियातों की बारिश है
दूर से ही मिलना है
ये चिलमनों की साज़िश है

कर ली दोस्ती उन पर्दों से 
उन पर्दों पे तेरा चेहरा जो था

Tuesday, April 28, 2020

करोना-क़ैद

ये दौर-ए-हालात हैं अजीब-ओ-गरीब से 
के अपनों को देखा कुछ ज़्यादा करीब से

जस्बातों की चादर में सलवट भी देखी
रिश्तों की नींद में करवट भी देखी

उम्मीदों के आँगन में दीवार भी थी
और प्यार के दरिया में दरार भी थी

दुखती हुई नव्ज़ को खामोश भी देखा
अनकहे अलफ़ाज़ का रोष भी देखा

देखा कई अरमां नज़रअंदाज़ थे
और कई आम मुद्दे छुपे राज़ थे

ये मन मुटाव के बादल सालों घिरते रहे 
हम मसरूफियत की चादर ओढ़े फिरते रहे 

जब हुए करोना-क़ैद घर में नसीब से
अपनों को देखा कुछ ज़्यादा करीब से 

Tuesday, April 14, 2020

शीशों की दीवार

रोशिनी मेरे कमरे 
में कम तो नहीं है
तेरी परछाइयों का ज़ालिम
पर ये सितम तो नहीं है 
मन टटोलता है
दूरियों के अँधेरे
कुछ लम्हों की मशाल
भी हाथ में है मेरे
गुफ्तगू की चिंगारियां 
ख़यालों में झूमती हैं
दीवानगी की जुगनी  
बंद घर में घूमती है 
ये घर भी कुछ अजीब है
के शीशों की दीवार है
घर में बहुत अज़ीज़ हैं
तू है, मगर उस पार है।

Wednesday, April 1, 2020

ज़हर


कैसा ये दौर है कैसा ये शहर है?
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

ज़मीन तो खुश है आसमान चहकता है
जंगल जवां है बाग़ फिर महकता है
दरियाओं  में भी उमंग की लहर है
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

छाती फैलाकर  दरख़्त तो बुलंद हैं
इंसानी इरादों का कारखाना बंद है
वक़्त की चाल में कैसा ये पहर है
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

तितली नाचती है भवरा गुनगुनाता है
यार दूर रहते हैं मोर छत पे आता है
जुगनू की रात है परिंदों की सहर है
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

ख्वाहिश पे ताला  मंसूबों की हड़ताल  
ताकतों की शिकस्त कीटाणु का कमाल 
सवाल पूछते हैं मंथन है या कहर है
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

ज़हर हज़म कर या उगल दे बहार
कुदरत को दोष दे या खुद कर इकरार   
तेरी करतूतों की तुझ पर ही मेहर है
कैसा ये दौर हैcकैसा ये शहर है 
हवा तो साफ़ है लोगों में ज़हर है

Sunday, March 1, 2020

कुछ नए मकाम



चलो जवानी से पीछा छूटा
अब काम के काम हो जाएं 
नोन तेल लकड़ी के आगे 
कुछ नए मकाम हो जाएं

फिकरों के हिसाब लगाकर
जोड़, घटा और भाग गुना कर 
वसीहतों पे नाम चढ़ाकर 
हम खुद अपने नाम हो जाएं 
अब काम के काम हो जाएं

जलवों के अरमानों से हटकर
हुस्न के रेशम जाल झटक कर
रिश्तों की गहराई समझकर
गहराई का अंजाम हो जाएं
अब काम के काम हो जाएं

दुनियादारी से न तोल कर
शौकों की गुल्लकें खोल कर
बस शौकीनों का ही मोल कर
उनमें ही नीलाम हो जाएं
अब काम के काम हो जाएं

एक और हकीकत है, जानकर
मायाजाल को हैरान कर
रूहानी सच्चाई  मानकर
उस सच में ही तमाम हो जाएं 
चलो जवानी से पीछा छूटाें
अब काम के काम हो जाएं 
नोन तेल लकड़ी के आगे 
कुछ नए मकाम हो जाएं