Saturday, May 1, 2021

वापस दे दो दुनियादारी


अंजानो से हाथ मिलाना

यारों को भी गले लगाना

बागीचों में साथ घूमना

हसीनों के वो हाथ चूमना

महफिलों में शेर सुनाना

दावतों में दावत खाना 

बस बस कर के जी भर पीना

जिम में जाकर छोड़ पसीना

भरी सड़क पर देना गाली

सिनेमा में सीटी और ताली

चाट पापड़ी सड़क किनारे

नाईट क्लब्स के वो लश्कारे

नई जगह पर सैर सपाटे 

ढाबों में वो गर्म पराठे 

कभी होड़ थी ओहदों की

कभी मुनाफों सौदों की

सृष्टि से भी जीत रहे थे 

कैसे दिन वो बीत रहे थे 

छूट गए सब महामारी में 

कुछ रहा नहीं दुनियादारी में

 

अब तो घर में चिंतन करते

चेतनाओं का मंथन करते

संसारिकता से मुँह मोड़ते 

नाता मोह माया से तोड़ते

हर दिन आंकड़ों को गिनता

दूर से ही अपनों की चिंता

साँसों में अब दर्द का घर है

धन दौलत और तन नश्वर है 

सृष्टि अंतर्मन में सारी

छूट गयी अब दुनियादारी

 

इतना सब होने के बाद 

करते ऊपर वाले को याद

पूछा उससे क्यों मरते हैं

भलमानस जो श्रम करते हैं

अच्छे भले लाचार हुए हैं

आखिर क्यों बीमार हुए हैं

इंसानियत क्यों हार रही है

ये महामारी क्यों मार रही है

माना ये दुनियादारी थी

जो हम पर इतनी भारी थी 

हम मुन्ने मुनिया में भी खुश थे

छोटी दुनिया में भी खुश थे 

फिर हम क्यों बीमार हुए

ऐसे क्यों लाचार हुए?   

भगवन कब तक ये लाचारी

वापस दे दो दुनियादारी

वापस दे दो दुनियादारी


 

Thursday, April 22, 2021

साँसों की हरकत


साँसों की हरकत 

पे शक है मुझे

यारों की कुर्बत

पे शक है मुझे

है कैसी मजबूरी 

ये दो गज़ की दूरी

अब उसकी रेहमत  

पे शक है मुझे


दिखता ही नहीं 

दायरा-ए-फलक 

छुपा है कहीं

वो रंगीं धुनक

कुदरत-ए-उसूल हो

हस्ब-ए-मामूल हो 

इस उम्मीद की जुरर्हत 

पे शक है मुझे

साँसों की हरकत 

पे शक है मुझे


कहर के चलते 

सब उधड़ रहा 

अनदेखे हरीफ़ से  

इंसां लड़ रहा

ये कौन सा ज़हर है 

जला रहा शहर है 

कायनात की वहशत

पे शक है मुझे

साँसों की हरकत 

पे शक है मुझे


बर्दाश्त नहीं है 

बेबस मजबूरी

मज़लूम न देगा 

इस को मंज़ूरी

अब इस लाचारी 

से जंग है हमारी  

और... 

लाचारी की ताकत

पे शक है मुझे

साँसों की हरकत 

पे शक है मुझे


Monday, April 12, 2021

वक़्त

वक़्त ने बर्बादी का बीड़ा उठाया है 

तारीख से इस ने हर शख्स मिटाया है 


इमारतों को खँडहर करार इसने किया है 

और यह गुनाह बार बार इसने किया है 

कहते हैं की वक़्त हर ज़ख्म भर देता है 

इस वहम को भी तार तार इसने किया है 

तेरी जुदाई ने हमें बरसों सताया है 

वक़्त ने बर्बादी का बीड़ा उठाया है?


ज़माने में इज़ाफ़ा ये वक़्त क्या करेगा?

जवानी का लिफाफा ये वक़्त क्या भरेगा?

लड़कपन गवा दिया इश्क़ के जूए में 

उस दाव पे मुनाफा ये वक़्त क्या करेगा?

सिलसिला उम्मीदों का इसने चलाया है? 

वक़्त ने बर्बादी का बीड़ा उठाया है


वक़्त सिर्फ इस लम्हे का मेहमान है

सपनों की बेसब्री से अनजान है?

एक तू है जिसे वक़्त ने फुर्सत से बनाया  

बता वक़्त तुझपे क्यों मेहरबान है?

हर बरस तेरे नूर में निखार आया है!

वक़्त ने बर्बादी का बीड़ा उठाया है?


Tuesday, April 6, 2021

मुलाक़ात

 देर सवेर मुलाक़ात तो होगी

तकल्लुफ से ही पर बात तो होगी

सबर भी है, उम्मीद भी है

फिर से सही, शुरुआत तो होगी

इश्क़ का ज़ोर जब असर कर दे

दुनिया इधर से उधर कर दे 

आज़मा के देखूं इश्क़ का ज़ोर 

कभी ये करामात तो होगी

तेरी बेरुखी खंजर सी है

ये रूह तेरे बिन बंजर सी है 

दीदार-ए-यार के प्यासे हैं हम

बेमौसम ही, बरसात तो होगी

ख्वाब और हकीकत के दरमियाँ

फासले तये करती कहानियां 

गुज़रती है सिर्फ ख़्वाबों में जो 

हकीकत में ववारदात तो होगी

चलो कल से

चलो कल से  तुम्हारे बिन गुज़ारा कर ही लेते हैं

वो रातों को जो अपनी थीं  पराया कर ही लेते हैं

वो गलियों में  न टहलेंगे जहाँ बदनाम  हम खुश थे

चलो कल से मोहल्ले से  किनारा कर ही लेते हैं


वफ़ा करनी थी तुमसे पर बे-वफा  जो तुम निकले

चलो कल से जफ़ाओं का नज़ारा कर ही लेते हैं


ये दिल तो सिर्फ  धड़कता है तुम्हारी ही अदाओं पर

चलो कल से ये दिल को हम  आवारा कर ही लेते हैं


वो तो शख्स  पराया था जिसे अपना लिया तुमने

चलो कल से उसे भी हम हमारा कर  ही लेते हैं


हमें तो उम्र भर तुम्ही  को चाहने की  तमन्ना थी

चलो कल से किसी से इश्क़ दोबारा कर ही लेते हैं


Wednesday, February 24, 2021

मंदिर


मंदिर 

अंतर्मन के मंदिर को
भौतिकता से जोड़ दिया
और बर्बरता के खँडहर को
बर्बरता से तोड़ दिया

एक विशाल जनमानस को
निद्रा से झकझोर दिया
अति नम्र मानवता को
नाश के मुख से मोड़ दिया

इतिहास के भावी पन्नो से
हास्य रस निचोड़ दिया
झूट के साहूकारों के
कथनों ने कफ़न ओढ़ लिया

अन्धकार की सदियों को
एक नया उदय और भोर दिया
कड़वे कोलाहल से कोमल
शंकों का पावन शोर दिया

बहुरंगी इस धरती पर
केसर को थोड़ा ज़ोर दिया
और कच्चे रंग सा जो बहता था
उस केसर ने बहना छोड़ दिया

अंतर्मन के मंदिर को
भौतिकता से जोड़ दिया
और बर्बरता के खँडहर को
बर्बरता से तोड़ दिया

मसरूफ़ियत की ढाल

 

ये कैसे दुश्मनी है

मेरी मेरे ख्यालों से

मुहब्बतों में उलझे

अनकहे सवालों से

अक्सर रातें जाग कर 

ख़्वाबों से जूझती है

रोज़ अकेलेपन में ये

हाल-ए-दिल पूछती हैं

ये शतरंज की बिसात है 

अजीब-ओ-गरीब जंग है

मोहरे स्याह सफ़ेद हैं

चालों का और ही रंग है

हमला सब तरफ से है

तलवार कहीं तो भाल है

घायल हुआ ख्यालों से  

मसरूफ़ियत ही ढाल है