न बादल घिरते हैं
न झूमते दरख़्त
न बिजली के चौंधे
से थमता है वक़्त
अंदर तो आंधी है
मन में ही बाँधी है
सुकून-ए-सूरत है
उबलता है रक्त
न बादल घिरते हैं
न झूमते दरख़्त
न बिजली के चौंधे
से थमता है वक़्त
अंदर तो आंधी है
मन में ही बाँधी है
सुकून-ए-सूरत है
उबलता है रक्त
एक छोटी सी खिड़की से
क्या क्या बसर हुआ
लगता हवा का झोंका था
तूफां सा असर हुआ
चाँद मासूम लगता था
चंचल तो चांदनी थी
थिरकती रही नज़रों में
पलकों में बांधनी थी
वो नोंक झोंक की चिलमन
जो सरकाई धीरे धीरे
एक हसीन शख्सियत
नज़र आयी धीरे धीरे
ये खिड़की खुली है
और खुली ही रहेगी
उम्मीद उन अदाओं से
चुलबुली ही रहेगी
दीवारों का हक़ अदा कर दो
खोलो खिड़की, दरवाज़ा बड़ा कर दो
प्यार होगा दायरों से
तो रुक जायेंगे लोग
ख़ाक होगा गर पहरा कड़ा कर दो?
अंजानो से हाथ मिलाना
यारों को भी गले लगाना
बागीचों में साथ घूमना
हसीनों के वो हाथ चूमना
महफिलों में शेर सुनाना
दावतों में दावत खाना
बस बस कर के जी भर पीना
जिम में जाकर छोड़ पसीना
भरी सड़क पर देना गाली
सिनेमा में सीटी और ताली
चाट पापड़ी सड़क किनारे
नाईट क्लब्स के वो लश्कारे
नई जगह पर सैर सपाटे
ढाबों में वो गर्म पराठे
कभी होड़ थी ओहदों की
कभी मुनाफों सौदों की
सृष्टि से भी जीत रहे थे
कैसे दिन वो बीत रहे थे
छूट गए सब महामारी में
कुछ रहा नहीं दुनियादारी में
अब तो घर में चिंतन करते
चेतनाओं का मंथन करते
संसारिकता से मुँह मोड़ते
नाता मोह माया से तोड़ते
हर दिन आंकड़ों को गिनता
दूर से ही अपनों की चिंता
साँसों में अब दर्द का घर है
धन दौलत और तन नश्वर है
सृष्टि अंतर्मन में सारी
छूट गयी अब दुनियादारी
इतना सब होने के बाद
करते ऊपर वाले को याद
पूछा उससे क्यों मरते हैं
भलमानस जो श्रम करते हैं
अच्छे भले लाचार हुए हैं
आखिर क्यों बीमार हुए हैं
इंसानियत क्यों हार रही है
ये महामारी क्यों मार रही है
माना ये दुनियादारी थी
जो हम पर इतनी भारी थी
हम मुन्ने मुनिया में भी खुश थे
छोटी दुनिया में भी खुश थे
फिर हम क्यों बीमार हुए
ऐसे क्यों लाचार हुए?
भगवन कब तक ये लाचारी
वापस दे दो दुनियादारी
वापस दे दो दुनियादारी
साँसों की हरकत
पे शक है मुझे
यारों की कुर्बत
पे शक है मुझे
है कैसी मजबूरी
ये दो गज़ की दूरी
अब उसकी रेहमत
पे शक है मुझे
दिखता ही नहीं
दायरा-ए-फलक
छुपा है कहीं
वो रंगीं धुनक
कुदरत-ए-उसूल हो
हस्ब-ए-मामूल हो
इस उम्मीद की जुरर्हत
पे शक है मुझे
साँसों की हरकत
पे शक है मुझे
कहर के चलते
सब उधड़ रहा
अनदेखे हरीफ़ से
इंसां लड़ रहा
ये कौन सा ज़हर है
जला रहा शहर है
कायनात की वहशत
पे शक है मुझे
साँसों की हरकत
पे शक है मुझे
बर्दाश्त नहीं है
बेबस मजबूरी
मज़लूम न देगा
इस को मंज़ूरी
अब इस लाचारी
से जंग है हमारी
और...
लाचारी की ताकत
पे शक है मुझे
साँसों की हरकत
पे शक है मुझे
वक़्त ने बर्बादी का बीड़ा उठाया है
तारीख से इस ने हर शख्स मिटाया है
इमारतों को खँडहर करार इसने किया है
और यह गुनाह बार बार इसने किया है
कहते हैं की वक़्त हर ज़ख्म भर देता है
इस वहम को भी तार तार इसने किया है
तेरी जुदाई ने हमें बरसों सताया है
वक़्त ने बर्बादी का बीड़ा उठाया है?
ज़माने में इज़ाफ़ा ये वक़्त क्या करेगा?
जवानी का लिफाफा ये वक़्त क्या भरेगा?
लड़कपन गवा दिया इश्क़ के जूए में
उस दाव पे मुनाफा ये वक़्त क्या करेगा?
सिलसिला उम्मीदों का इसने चलाया है?
वक़्त ने बर्बादी का बीड़ा उठाया है
वक़्त सिर्फ इस लम्हे का मेहमान है
सपनों की बेसब्री से अनजान है?
एक तू है जिसे वक़्त ने फुर्सत से बनाया
बता वक़्त तुझपे क्यों मेहरबान है?
हर बरस तेरे नूर में निखार आया है!
वक़्त ने बर्बादी का बीड़ा उठाया है?
देर सवेर मुलाक़ात तो होगी
तकल्लुफ से ही पर बात तो होगी
सबर भी है, उम्मीद भी है
फिर से सही, शुरुआत तो होगी
इश्क़ का ज़ोर जब असर कर दे
दुनिया इधर से उधर कर दे
आज़मा के देखूं इश्क़ का ज़ोर
कभी ये करामात तो होगी
तेरी बेरुखी खंजर सी है
ये रूह तेरे बिन बंजर सी है
दीदार-ए-यार के प्यासे हैं हम
बेमौसम ही, बरसात तो होगी
ख्वाब और हकीकत के दरमियाँ
फासले तये करती कहानियां
गुज़रती है सिर्फ ख़्वाबों में जो
हकीकत में ववारदात तो होगी