तुम्हारी पुस्तक का एक पन्ना
सजा दिया है ये शायरी से
हर सिफहा बाकी निसार तुमपे
नवाज़ो अपनी कारीगरी से
वो तनहा लम्हे जो तुम गुज़ारो
इस छोटे तोहफे के संग अपने
वो लम्हों संग मेरी चाहतों की
महक उठेगी इस डायरी से!
तुम्हारी पुस्तक का एक पन्ना
सजा दिया है ये शायरी से
हर सिफहा बाकी निसार तुमपे
नवाज़ो अपनी कारीगरी से
वो तनहा लम्हे जो तुम गुज़ारो
इस छोटे तोहफे के संग अपने
वो लम्हों संग मेरी चाहतों की
महक उठेगी इस डायरी से!
ये ज़माना क्या जाने की
आतिशबाज़ी क्या होती है
पंद्रह साल पुरानी होकर
उल्फत ताज़ी क्या होती है
अल्हड़पन की ख्वाहिश को
पकी उम्र में पाया जो
तब जाना के दिल हरवाके
जीती बाज़ी क्या होती है
इतने बरसों की दूरी से
हालातों की मजबूरी से
लगा निशाना तो जाना के
तीरंदाज़ी क्या होती है
जश्न-ऐ-मुशाबरत मनाके
जिस्मों की वो प्यास मिटाके
पहली बार एहसास किया के
खुश-मिजाज़ी क्या होती है
अर्सों पहले शेर सुनाके
जवां हुस्न का दिल फुसलाके
हमराज़ों को जता दिया के
दूर-अंदाज़ी क्या होती है
आशिक़ हूँ मैं ये माना है
इश्क़ तेरा एक पैमाना है
इसको पा के पता लगा
के इश्कबाज़ी क्या होती है!
बस मिलती है ज़िल्लत, अक़ीदत नहीं
भयानक बला है, गनीमत नहीं
पर आशिक़ से पूछो तो बोलेगा वो
मुहब्बत है जन्नत, मुसीबत नहीं
तू आशिक़ नहीं तो तू समझेगा क्या
इस मजमे में तेरी शरीकत नहीं
बेमानी है जीना मुहब्बत बिना
ऐ दोस्त, ये मेरी नसीहत नहीं
हुस्न वालों को उसने बनाया है खूब
सूरत तो दी है पर सीरत नहीं
है हुनर, मैं परखता हूँ हीरों को
दुनिया में आशिक़ की कीमत नहीं
मशहूर कसीदे मोहब्बत के हैं
हैं किस्से कहानी -- हकीकत नहीं
जो शिद्दत से किया था इश्क़
दोबारा हो नहीं सकता
के इसके एवज़ दौलत का
तिजारा हो नहीं सकता
खंजर पीठ पर जिनने
भोंका है वो हाथों में
मेरा तो दिल ये कहता है
तुम्हारा हो नहीं सकता
तेरी चाहत को परखे बिन
गुज़ारा जिस ने भी जीवन
उससे ज़्यादा तो किस्मत
का मारा हो नहीं सकता
तू जो आये महफ़िल में
तुझे कोई और न देखे
जो देखे तो मुझे वो शक़्स
गवारा हो नहीं सकता
मीठा लहजा है उसका
जुबां भी उसकी मीठी है
ऐ दरियादिल तेरा पानी
तो खारा हो नहीं सकता
तू मेरे रु-बा-रु भी हो
तेरी आँखों में झाँकू मैं
ख़ुशनुम्मा इससे ज़्यादा
नज़ारा हो नहीं सकता
हम क्यों ज़िन्दगी से गिला करते हैं
खामखां उस शक़्स से मिला करते हैं
भूल जाओ वो हारी हुई बाज़ी को
शुरू एक नया सिलसिला करते हैं
बढ़ गए हैं फासले कशिश बुलंद रही
तेरी बेरुखी भी हमको पसंद रही
बस इस उम्मीद पर ही के तू खाब में दिखे
रत जगे किये थे पर आँखें बंद रहीं
बेशुमार हैं सितम तूने जो थे किये
हसीं लम्हों की याद मेरे पास चंद रहीं
शर्तें वो प्यार की मंज़ूर न थी तुझको
चाहत मेरी हर शर्त से रज़ामंद रही
सुलग रहा था मैं जब उल्फत की आग में
तेरी तरफ से लौ थोड़ी मंद मंद रही
ऐलान ऐ मुहब्बत का वादा नहीं है
वो दिल जीतने पे अमादा नहीं है
मेहबूबा पे वो जां छिड़कने है आया
कुछ पाने का उसका इरादा नहीं है
अधूरी रहेगी ये दास्ताँ ऐ उल्फत
पर इश्क़ ये हरगिज़ भी आधा नहीं है
बेवफाई का रास्ता है टेढ़ा मेढ़ा
और वफ़ा का भी सीदा सादा नहीं है
सियासत के ठेकेदारों का रुतबा
दौलत और दम है, मर्यादा नहीं है
बिसात के आखिरी घर पे जो अदना है
चालों का राजा है, वो प्यादा नहीं है
वाह वाही की गूँजें, ये तालियों का शोर
शायर की उम्मीद इससे ज़्यादा नहीं है