Monday, November 16, 2020

वाह वाही


 उजालों के मजमे रहनुमाई नहीं देते 

दिवाली में अँधेरे दिखाई नहीं देते


हर लौ महज़ रोशन उजाले  नहीं करती

परवानों के मातम हैं, सुनाई नहीं देते 


अर्सों से हमें मर्ज़-ए-मोहब्बत की सज़ा है  

चारागर तुम ही हो, दवाई नहीं देते 


सब कुछ जो लुटा देते थे शायर की कलम पर

इस दौर में दो बूँद तक स्याही नहीं देते


ज़माना मेरे शेरों को सुनने चला आये

एक तुम ही हो जो वाह वाही नहीं देते


उजालों के मजमे रहनुमाई नहीं देते 

दिवाली में अँधेरे दिखाई नहीं देते


Sunday, October 18, 2020

ज़िन्दगी आईने में दिखती फरक है

ज़िन्दगी आईने में दिखती फरक है

हर मंज़िल की थोड़ी मंदी सी चमक है

टेढ़े मेढ़े रस्तों से जो गुज़रे हैं हम

जवानी में लगता था सीधी सड़क है


हर मोड़ पे कई चेहरे अनजान मिले 

कुछ मेहरबान मिले, कुछ बेईमान मिले

जब हमसफ़र बने तो पता न चला

ये संगत का असर है बुरा या भला

तजुर्बों से सीखा नया एक सबक है

ज़िन्दगी आईने में दिखती फरक है  


खूब रफ़्तार से मुहब्बत करके भी देखी

मस्त हवाओं में उड़ान भरके भी देखी

पथरीले वो मंज़र, हवाओं के झोंके

वो गिरना संभालना और नज़रों के धोखे 

सख्त दिल ये ज़मीन और बेरहम फलक है

ज़िन्दगी आईने में दिखती फरक है  

  

मुड़कर जो देखें तो बुरा हाल तो होगा

मौके जो चूके, उनपर मलाल तो होगा 

वक़्त जाया कर जब भी सराहे नज़ारे 

किसी हमसफ़र संग गिने थे सितारे

वही पल में हसीं यादों की झलक है

ज़िन्दगी आईने में दिखती फरक है  

  

लम्हे थे जो जमकर जी लिए मैंने 

अब परदे आईनों पे सी दिए मैंने

नज़र सामने है, और सीधी ही है सड़क

मोड़ आएं तो आएं, चलूँगा बेधड़क

वो जीना क्या जो हर कदम पे हिचक है

ज़िन्दगी आईने में दिखती फरक है


 ज़िन्दगी आईने में दिखती फरक है

हर मंज़िल की थोड़ी मंदी सी चमक है

टेढ़े मेढ़े रस्तों से जो गुज़रे हैं हम

जवानी में लगता था सीधी सड़क है


Friday, October 2, 2020

हसीनों से दिल तो लगाना पड़ेगा


हसीनों से दिल तो लगाना पड़ेगा

शायर हूँ, ये जोखिम उठाना पड़ेगा


इश्क़ का इत्तर लव्ज़ों में तोलकर  

काफियों में खयालात बोलकर

हालात-ए-जिगर तो सुनाना पड़ेगा

शायर हूँ, ये जोखिम उठाना पड़ेगा


मुखड़े की रौनक मुखड़े में  डाल

अंतरे में लिखूं मैं दिल का हाल

नज़ाकत से उनको लुभाना पड़ेगा

शायर हूँ, ये जोखिम उठाना पड़ेगा


मुद्दे तो हैं चुनने को मगर 

श्रोता तो हों सुनने को इधर! 

रोज़गार मुझे भी कमाना पड़ेगा

शायर हूँ, ये जोखिम उठाना पड़ेगा


हसीनों से दिल तो लगाना पड़ेगा 

शायर हूँ, ये जोखिम उठाना पड़ेगा


Saturday, September 19, 2020

आईने से मुहब्बत

 

आईने से मुहब्बत इतनी न करो

ज़ालिमाना ये हरकत इतनी न करो

आईनों की तारीफें अच्छी हैं मगर

हम शायरों की ज़िल्लत इतनी न करो 


हाँ वाजिब है तेरी ज़ुल्फ़ों का इतराना

बिना लव्ज़ों के पूरी ग़ज़ल कह जाना

शेर कुछ हम कहें इसका मौका भी तो दो 

खुद अपने से ही उल्फत इतनी न करो  

हम शायरों की ज़िल्लत इतनी न करो 


सेल्फी में वो तबस्सुम केहर ढाती है

कभी कभी वो तस्वीर नज़र आती है 

हम आशिक़ तस्वीर से कर लेंगे गुज़ारा

तुम तस्वीरों में किल्लत इतनी न करो

हम शायरों की ज़िल्लत इतनी न करो 


ज़ुल्मों को तेरे देख रही है खुदाई 

मिसाल बन रही है तेरी बेपरवाही 

नज़र में खुदा की ये हिमाकत होगी

इसलिए ये हिमाकत इतनी न करो 

हम शायरों की ज़िल्लत इतनी न करो 


Friday, September 11, 2020

अनजानों का मजमा

अनजानों का मजमा
फासलों को भरता है
वाकिफ तो दूरियों का
अहसास दिलाते हैं

दूर जो मशाल 
जल रही है तेरी
देख उसे अंधेरों में
हम सुकून पाते हैं

वक़्त की सुरंग में
गुंजाइश नहीं है रुकने की
गुज़रते लम्हों के पाँव 
हमें कुचले जाते हैं

तुम खड़े रहना 
अपनी बाहें फैलाए
हम न सही हमारे ख़याल
वहीँ डेरा जमाते हैं

हमारी मुलाकातें

हमारी मुलाकातें होतीं हैं
शायद तुझे अहसास नहीं

ख़यालों में तुझे बुलाता हूँ
तेरी ज़ुल्फ़ों को सहलाता हूँ
दिन कैसे गुज़रा 
ये बताता हूँ
रोज़मर्रा की बातें हैं
ऐसी तो कोई ख़ास नहीं
हमारी मुलाकातें होतीं हैं
शायद तुझे अहसास नहीं

तेरे सपनों को सुनता हूँ
अपने भी थोड़े बुनता हूँ
यादों में जो चमक रहे
मैं उन लम्हों को चुनता हूँ
दूर से उनको देख के खुश हूँ
क्यूंकि अब वो मेरे पास नहीं
हमारी मुलाकातें होती हैं
शायद तुम्हें एहसास नहीं

कुछ खालीपन तो लगता है
एक मीठा दर्द सुलगता है
आशिकानापन 
तनहा शामों का ठगता है
कहने को तो सब ठीक है
कोई गम नहीं, मैं उदास नहीं
हमारी मुलाकातें होती है
शायद तुझे अहसास नहीं

इबादत की इजाज़त

इबादत की इजाज़त तू मुझे दे दे

तेरे जलवों की हसरत तू मुझे दे दे 

फिरता हूँ बेमकसद गलियों में तेरी

आशिक़ाना ये मकसद तू मुझे दे दे 


तू नज़दीक है, इस बात का मैं खैर करूँ 

और आशिक़ भी हैं, उन सब से मैं बैर करूँ  

लम्हा ही सही, दूर से कर लूँगा दीदार 

लम्हे में भरी मुद्दत तू मुझे दे दे 


पिरोए हैं ज़ुल्फ़ों में तेरे ख्वाब कई 

डुबो दिए तेरे नूर में आफताब कई  

वफ़ाएं और भी हैं निभाने के लिए

बेवफाई की तोहमत तू मुझे दे दे 


कहे तू के मैं खुद की हदों में रहूँ

बेसुद्ध या बेहाल मयकदों में रहूँ 

हो नशा तेरा, किसी शराब का न हो 

इसी सुरूर की ग़फ़लत तू मुझे दे दे 


यूँ तो चाहत की कीमत बहुत सस्ती है

तेरी आँखों की चमक ही में ये बस्ती है

तू इधर देख, चकाचौंध नज़ारा होगा

उस नज़र से मुहब्बत तू मुझे दे दे     


इबादत की इजाज़त तू मुझे दे दे

तेरे जलवों की हसरत तू मुझे दे दे 

फिरता हूँ बेमकसद गलियों में तेरी

आशिक़ाना ये मकसद तू मुझे दे दे