Sunday, June 20, 2021

यकीन है मुझको के चाहती हो तुम मुझे

यकीन है मुझको के चाहती हो तुम मुझे 

ख़्वाबों में अपने रोज़ बुलाती हो तुम मुझे 

के घूमता रहता हूँ ख्यालों में रात दिन 

घुमा घुमा के रोज़ थकाती हो तुम मुझे 

यकीन है मुझको के चाहती हो तुम मुझे 


अरमान तुम्हारे भी मुकम्मल ज़रूर हों

शिकवे गिले जो हैं एक इशारे से दूर हों

शिद्दत से जो करती हो वो सुनते हैं दुआ हम 

दुआओं की बंदिश में बंधाती हो तुम मुझे 

यकीन है मुझको के चाहती हो तुम मुझे 

 

संजीदगी से ज़िन्दगी को देख लो मगर

सफर तो सिर्फ एक है, पर लाख हैं डगर 

हंसी ख़ुशी चलती रहो पर याद ये रखो 

हंसाता तुम्हें मैं हूँ, हंसाती हो तुम मुझे

यकीन है मुझको के चाहती हो तुम मुझे 


कितना भी धकेलो मुझे तुम फ्रेंड ज़ोन में 

तस्वीर मेरी छिपी तुम्हारे भी फ़ोन में

अपनी अदाओं से और अपने ही लहज़े से 

फेसबुक के ज़रिये रिझाती हो तुम मुझे

यकीन है मुझको के चाहती हो तुम मुझे  


Sunday, June 13, 2021

दराज़ों में कागज़

 दराज़ों में वो कागज़ हैं जिन्हें स्याही नहीं भाई

वो लव्ज़ों का तकाज़ा था के आँखें मेरी भर आईं 

लिखावट और मेरे आंसूं लिपट के यूं जो रोये थे

के गल के बह गयी वो नज़्म जो फिर लिक्खी न दोहराई


हुनर मेरे कलम का तो ज़माने को न रास आया

मुहब्बत की फतह का गीत अकेले मैंने ही गाया 

कदरदानों की महफ़िल में बिके थे शेर बस इस खातिर

के अपने दिल के घावों को ही मैंने पेश फ़रमाया 


सफेदी है जो बालों में वही तो स्याही है मेरी

वो किस्से हैं मुहब्बत के वही रुबाई है मेरी

वो बेरंग हैं ये कागज़ और वो बेरंग है ये स्याही भी

इसे पढ़ना नहीं आसान  के ये तन्हाई है मेरी


अभी उम्मीद नहीं छोड़ी के मेरे शेर पढ़ोगी तुम

वो पत्थर दिल भी पिघलेगा के मेरी ओर बढ़ोगी तुम

वो कागज़ जो दराज़ों में छुपे बैठे थे इतने दिन

के अपनी सुर्ख वफाओं से हाँ उनपर कुछ लिखोगी तुम


Saturday, June 12, 2021

शांत ज्वालामुखी

 न बादल घिरते हैं  

न झूमते दरख़्त

न बिजली के चौंधे

से थमता है वक़्त

अंदर तो आंधी है 

मन में ही बाँधी है  

सुकून-ए-सूरत है  

उबलता है रक्त 


Thursday, June 3, 2021

छोटी सी खिड़की

 एक छोटी सी खिड़की से

क्या क्या बसर हुआ 

लगता हवा का झोंका था

तूफां सा असर हुआ 


चाँद मासूम लगता था

चंचल तो चांदनी थी

थिरकती रही नज़रों में

पलकों में बांधनी थी


वो नोंक झोंक की चिलमन

जो सरकाई धीरे धीरे

एक हसीन शख्सियत 

नज़र आयी धीरे धीरे


ये खिड़की खुली है

और खुली ही रहेगी

उम्मीद उन अदाओं से 

चुलबुली ही रहेगी


Saturday, May 29, 2021

दीवारों का हक़

 दीवारों का हक़ अदा कर दो

खोलो खिड़की, दरवाज़ा बड़ा कर दो

प्यार होगा दायरों से

तो रुक जायेंगे लोग

ख़ाक होगा गर पहरा कड़ा कर दो?

Saturday, May 1, 2021

वापस दे दो दुनियादारी


अंजानो से हाथ मिलाना

यारों को भी गले लगाना

बागीचों में साथ घूमना

हसीनों के वो हाथ चूमना

महफिलों में शेर सुनाना

दावतों में दावत खाना 

बस बस कर के जी भर पीना

जिम में जाकर छोड़ पसीना

भरी सड़क पर देना गाली

सिनेमा में सीटी और ताली

चाट पापड़ी सड़क किनारे

नाईट क्लब्स के वो लश्कारे

नई जगह पर सैर सपाटे 

ढाबों में वो गर्म पराठे 

कभी होड़ थी ओहदों की

कभी मुनाफों सौदों की

सृष्टि से भी जीत रहे थे 

कैसे दिन वो बीत रहे थे 

छूट गए सब महामारी में 

कुछ रहा नहीं दुनियादारी में

 

अब तो घर में चिंतन करते

चेतनाओं का मंथन करते

संसारिकता से मुँह मोड़ते 

नाता मोह माया से तोड़ते

हर दिन आंकड़ों को गिनता

दूर से ही अपनों की चिंता

साँसों में अब दर्द का घर है

धन दौलत और तन नश्वर है 

सृष्टि अंतर्मन में सारी

छूट गयी अब दुनियादारी

 

इतना सब होने के बाद 

करते ऊपर वाले को याद

पूछा उससे क्यों मरते हैं

भलमानस जो श्रम करते हैं

अच्छे भले लाचार हुए हैं

आखिर क्यों बीमार हुए हैं

इंसानियत क्यों हार रही है

ये महामारी क्यों मार रही है

माना ये दुनियादारी थी

जो हम पर इतनी भारी थी 

हम मुन्ने मुनिया में भी खुश थे

छोटी दुनिया में भी खुश थे 

फिर हम क्यों बीमार हुए

ऐसे क्यों लाचार हुए?   

भगवन कब तक ये लाचारी

वापस दे दो दुनियादारी

वापस दे दो दुनियादारी


 

Thursday, April 22, 2021

साँसों की हरकत


साँसों की हरकत 

पे शक है मुझे

यारों की कुर्बत

पे शक है मुझे

है कैसी मजबूरी 

ये दो गज़ की दूरी

अब उसकी रेहमत  

पे शक है मुझे


दिखता ही नहीं 

दायरा-ए-फलक 

छुपा है कहीं

वो रंगीं धुनक

कुदरत-ए-उसूल हो

हस्ब-ए-मामूल हो 

इस उम्मीद की जुरर्हत 

पे शक है मुझे

साँसों की हरकत 

पे शक है मुझे


कहर के चलते 

सब उधड़ रहा 

अनदेखे हरीफ़ से  

इंसां लड़ रहा

ये कौन सा ज़हर है 

जला रहा शहर है 

कायनात की वहशत

पे शक है मुझे

साँसों की हरकत 

पे शक है मुझे


बर्दाश्त नहीं है 

बेबस मजबूरी

मज़लूम न देगा 

इस को मंज़ूरी

अब इस लाचारी 

से जंग है हमारी  

और... 

लाचारी की ताकत

पे शक है मुझे

साँसों की हरकत 

पे शक है मुझे