Monday, June 20, 2022

मुलाकातों की खुशबू


मुलाकातों की  खुशबू में मेरे ये दिन  गुज़रते हैं

इत्तर तेरा महेकता है फक्र गुलज़ार करते हैं 

पुरानी है  वो खुशबू और वो किस्से भी पुराने हैं 

नए अलफ़ाज़ में उलझे ये शेरों में उमड़ते हैं 


चुराते हैं वो बारिश से तरी मिट्टी का सोंधापन 

तेरे अहसास के झोंके मेरी साँसों को भरते हैं 


अगरबत्ती की शिद्दत है तेरी यादों के धुंए में

के हम तो राख ही बनकर हर दिन यूं बिखरते हैं  

  

ये खुशबू ही तो ज़ालिम है हवाओं में मचलती है

मेरे तो ख्वाब इसी को ढून्ढ तरसते और निखरते हैं 


तेरी दुनियासे बिछड़े पल हैं जैसे आग में संदल 

उसी माफिक मेरे जज़्बात महक महक के मरते हैं 


मुलाकातों की खुशबू में मेरे तो दिन गुज़रते हैं

इत्तर तेरा महेकता है कई गुलज़ार संवरते हैं


Sunday, February 27, 2022

पगडण्डी

बहुत अरसे से मजमों संग 

उन्हीं की चाल, उन्हीं के ढंग 

में चौड़ी सी सड़क पे चल 

के ढूंढे ज़िन्दगी के हल


उम्मीदों की भरी मंडी

से हटकर एक वो पगडण्डी

मिली मुझको तो मैं ठहरा

सफर का था नया चेहरा


ये पगडण्डी है पतली सी

टेढ़ी मेढ़ी और मचली सी

हर कदम पे अंगड़ाई 

सफर में  मंज़िलें पाई 


मसरूफ भी हूँ, फुर्सत भी है

तनहा भी हूँ, कुर्बत भी है

उड़ जाता हूँ ख्यालों पर 

रुक जाता हूँ, दोराहों पर 


दोराहे इंतेखाब नहीं

हर लम्हे का हिसाब नहीं\

दो राहों पर भी चलता हूँ

गिरता भी हूँ फिसलता हूँ


डगरों की अब फ़ौज लगी है

हर डगर पर मौज लगी है

पगडंडियों से यारी है

और उम्र पड़ी अब सारी है


Monday, January 31, 2022

ख़ास धूप

 वो धूप थोड़ी ख़ास थी

कैसे बयां करूँ

बहुत दिनों से आस थी 

कैसे बयां करूँ

कुर्बत के एक सिरे को

पकडे खड़ा था मैं

अरसे से इसी  ज़िद्द पे

जमकर अड़ा था मैं 

आज तू भी कितने पास थी

कैसे बयां करूँ 


उमंगों की महफ़िल थी 

कैसे बयां करूँ 

अदाएं तेरी कातिल थीं 

कैसे बयां करूँ 

जज़्बातों के मज़मून 

किताबों से पढ़ दिए

तस्वीरों से वो लम्हे 

यूँ यादों में जड़ दिए 

उस टीले पे झिलमिल थी 

कैसे बयां करूँ 

 

बातों में एक रुझान था 

कैसे बयां करूँ

रूमानी आस्मान था 

कैसे बयां करूँ 

चाय के गर्म प्याले का 

नसीब देख लो 

चुस्की भी लेलो चाव से

और हाथ सेख लो 

मेरा भी वो अरमान था

कैसे बयां करूँ 


Wednesday, January 12, 2022

आलिंगन

 ललक लड़कपन की लाये

हलचल ह्रदय की हर्षाये

वर्षों विलम्बित और वंचित

संयोगता से सुसंचित

मधुर मिलन मंशानुसार 

सुदृढ़ हुआ ये साक्षात्कार    


तृष्णा तेरी, मेरा तर्पण

दृष्टि तेरी, मेरा दर्पण 

अर्चन तेरी, मेरा अर्पण 

मीठा मनोभावित मिश्रण 

सरल संभावों का स्पंदन

है आलोकिक ये आलिंगन 


Saturday, January 8, 2022

मसला इतना गंभीर नहीं

 मसला इतना गंभीर नहीं

चाहत है ये, ज़ंजीर नहीं

इज़हार-ए-मुहब्बत तो है पर

कोई पत्थर पे लकीर नहीं

     

मौसम बदलते हैं दिल के

तू चार कदम तो चल मिल के

इसमें तो कुछ तक़रीर नहीं 

मसला इतना गंभीर नहीं


बहक जाते हैं सबके मन

तू भी दिखाले अपनापन 

मैं संत नहीं तू पीर नहीं

मसला इतना गंभीर नहीं


तौबा के ये हालात मिलें

के इश्क़ मुझे खैरात मिले 

आशिक़ हूँ मैं, फ़क़ीर नहीं

मसला इतना गंभीर नहीं 

चाहत है ये, ज़ंजीर नहीं 


Wednesday, December 29, 2021

हक़ है तुझे

तू फासले बनाये रख

ये हक़ है तुझे

उल्फतें दबाये रख

ये हक़ है तुझे

ये दिल ही के जज़्बात हैं 

जो ज़्याती मामलात हैं 

तू हमें पराए रख

ये हक़ है तुझे 


तेरे बहुत अज़ीज़ हैं

अदाओं के मरीज़ हैं

ये रोग तू फैलाये रख

ये हक़ है तुझे


जो तेरे दीवानें हैं

फितरत से परवाने हैं

तू शम्मा जलाये रख

ये हक़ है तुझे


उस नज़र में बयान है

तेरी चाह का सामान है

तू नज़रें झुकाये रख

ये हक़ है तुझे 


बेशक हमें बदनाम कर 

बेइज़्ज़त सर-ए-आम कर

खुद दामन बचाये रख

ये हक़ है तुझे


Saturday, October 23, 2021

आव्यशकता


भावनाओं की अभीव्यक्ति

आव्यशक प्रतीत होती है 

कोई अति-विशेष व्यक्ति  

आव्यशक प्रतीत होती है


हमने उपेक्षा अनुसार

निडर हो, कर दिया उच्चार 

अब आपकी ओर से आसक्ति 

आव्यशक प्रतीत होती है

 

क्षमता आलिंगन में नहीं

आपके मधुर कथन में है

अधरों से निकली वो शक्ति

आव्यशक प्रतीत होती है 


भेद भाव विचारों में होंगे 

इन भेद भावों का स्वागत है

ये वार्तालापों की युक्ति

आव्यशक प्रतीत होती है


ये संबंधों में संदेहमयी 

आलोचनाएं भी आएँगी

मन में इस विचरण से मुक्ति

आव्यशक प्रतीत होती है


मेरे अंतर्मन का दृश्य 

सम्पूर्णता की मूरत तुम हो 

सम्पूर्णता की ऐसी भक्ति 

आव्यशक प्रतीत होती है