Monday, June 24, 2024

नफरत की देहलीज़ nafrat ki dehleez

नफरत की देहलीज़ पे

कितने तबाह हुए 

सदियों की तारीख में

क्या क्या गुनाह हुए

नफरत को क्या कोसें 

कुछ मज़हबी इश्क़ के 

खुशवहमी ख्याल में 

पूरे फनाह हुए


भरे बाज़ार ज़ुल्म को

रोकें तो किस तरह 

मूक, बधिक और अंधे

सारे गवाह हुए


टीस उठे जब दर्द की

बेबस रुलाई में

गैरों का शोक मानकर 

सब बेपरवाह हुए

 

किसने किसकी जान ली

हुआ पहला वार क्यों 

अफवाहों की भीड़ में 

हम खुद अफवाह हुए


जो लड़ रहा है सोच 

तुझे हांकता है कौन 

कौन चाहता है जंग ये

बिना सुलह हुए 


बैठे दूर दराज़ जो 

चिंगारी को दें फूंक 

दरबार-ऐ-हार-जीत में   

वो जहाँपनाह हुए

Sunday, June 16, 2024

मेरी लिखावट meri likhaavat

तलाशा है 

ज़माने ने

मुझे मेरी

लिखावट में

उलझे फिर  

रहे हज़रात

ये लव्ज़ों की

सजावट में


नहीं समझे 

के मकसद और 

है सुनने

सुनाने का 


वो तहखाना 

तुम्हारा है

ये शेरों की

इमारत में 


भरी महफ़िल

में सुनते हो

वो किस्से जिस 

खुदाई के


सजदा उस को  

तुम करते हो  

छुप छुप कर

इबादत में


मेरे शेरों

की वाह वाही 

जो करते हो 

तहे दिल से 


है अरमानों 

की जिरह वो 

तुम्हारी ही

वकालत में


कभी मरहूम

मुहब्बत हो

हो एक तरफ़ा 

कभी वो इश्क़


है मरहम का 

सौदा नज़्म 

जो पढ़ता मैं 

तिजारत में 


कभी हो ज़ुल्म

अज़ीज़ों पर 

हुकूमत की

बदौलत तो 


जज़्बे को मैं

करता सख्त 

सुनाकर शेर

बग़ावत में 


तुझे ओ हुस्न

जो करती है

मुझपर ज़ुल्म

ही दिन-बर-दिन


लिखे लहू 

से दिल पर शेर

नज़र तुझपर

सदाकत में 

Friday, May 3, 2024

ख़ुशी khushi

 गिन्नियों की खनक में

महफिलों की चमक में

कामयाबी की हदों में 

झिलमिल शोहरतों में 

ढूंढी बहुत पर नहीं मिली 

तुतलाती ज़ुबानों में 

तकिये  सिरहानों में 

दादी के मर्तबानों में 

मिलने के बहानों में

यारों के ठिकानों में 

दिल-फैंक अफसानों में

ख़ुशी बिखरी पड़ी मिली 


Saturday, April 20, 2024

रफ़्तार कारवां की raftaar kaarvaan ki

 रफ़्तार कारवां की

अब कम हो चली है

जद्दोजहद सब  

हज़म हो चली है

देते थे सराब

मकसद-ऐ-ज़िन्दगी

अब ज़िन्दगी खुद 

वहम हो चली है

लुत्फ़ आशिकी के

माशूक संग मनाये

ये माशूक किसीकी 

बेगम हो चली है

इत्र की मिलावट

साँसों में याद उनकी 

कम्बख्त याद अब वो

मरहम हो चली है

देखते थे सपने

दोनों जिस नज़र से

उम्र संग नज़र भी

कुछ नम हो चली है

संजीव क्या लिख्खे 

मसले सब तरफ हैं 

ये कायनात मेरी

कलम हो चली है 


Sunday, March 31, 2024

मौसम mausam

 ये मौसम को बदलने दो

पहाड़ों को पिघलने दो

उबल जाएँगी सब नदियाँ 

वो नदियों को मचलने दो


हवाओं में जो खुशबू है

उसे तुम कैद मत करना 

यही आवाज़ गुलों की है

फ़िज़ा में इसको घुलने दो

 

जो भीगे हैं ये बारिश में

बिना छातों के निकले थे 

गली में उनकी फिसलन थी 

उस फिसलन में फिसलने दो 


अब गरम दौर भी आएगा

चलेगा कायदा लूह का 

अब इज़्ज़त दो कानूनों को

लापरवाहों को जलने दो 


ये मौसम को बदलने दो

पहाड़ों को पिघलने दो

उबल जाएँगी सब नदियाँ 

वो नदियों को मचलने दो


Saturday, January 20, 2024

हमसफ़र hamsafar

 मेरी ज़िन्दगी में तू

मेरा हमसफ़र नहीं

के मैं किस तरफ चला

ये तुझे खबर नहीं

मेरे काफिले में हैं

वो अज़ीज़ बेशुमार

जो हैं तो आस पास 

पर उस कदर नहीं


कयामतों के झोंके

बरज़ोर मुझपे बरसे

तेरी याद को भुला दें 

उनमें असर नहीं


राहों में कितनी भटका

और चौखटों को ताका 

तेरे आंगनों की ज़िद्द थी 

यूं दर-ब-दर  नहीं 


बेताबी बस ये रहती 

हर सुबह तुझको देखूं

किस्मत में मेरी पर ये

हसीं सहर नहीं 

 

ज़माने ने दाद भी दी

बहुतों ने मुझको चाहा

जो तक रहीं हैं उनमें

तेरी नज़र नहीं


तू मुनसियत  है मेरी

तेरी आशिकी की लत है

दुनिया में आशिकी से 

बढ़कर ज़हर नहीं

Tuesday, October 3, 2023

वक़्त से बातचीत waqt se baatcheet


ये पूछता है मुझसे

अब वक़्त का तक़ाज़ा 

यहां तक तू पहुंचा 

अगला मुकाम क्या है


            ऐ वक़्त तू है ज़ालिम

            है  इस तरह नवाज़ा

            ऐंठे हैं दाम अब तक

            तो अगला दाम क्या है?


काम मेरा मैं खोलूं 

फिर नया दरवाज़ा 

तू बढ़ के खोल उसको

तेरा और काम क्या है?


            उम्मीद है ये बासी

            तू पेश कर कुछ ताज़ा

            ये ज़िन्द्दगी है बाकी

            तेरा इंतज़ाम क्या है?


वो इंतज़ाम मेरा

तो है एक जनाज़ा 

तेरी जंग तय करेगी

तेरा अंजाम क्या है 


            रिश्तों की दास्तान है    

            ज़िन्दगी लिहाज़ा

            रिश्तों में ढूंढ़ता हूँ 

            मेरा अहतराम क्या है