shayadshayar
Sunday, October 30, 2016
इंद्रधनुष
इंद्रधनुष मटमैला मंज़ूर है
ये ज़िद्द है के मेरा गुरूर है
आसमां और भी थे जिन्हें छू सकता था मैं
इस सतरंगी मायाजाल में कुछ तो ज़ुरूर है!
गुज़र गया दिन
गुज़र गया दिन
या गुज़ारा मैंने
पूछ लिया सवाल
ये दोबारा मैंने
ख़्वाबों के शहर में
घूमा था मैं आज
देखा एक नया
नज़ारा मैंने
गुज़र गया दिन
या गुज़ारा मैंने
पन्ने पल्टाए थे
अनपढ़ी किताबों के
लव्ज़ों के खेल को
निहारा मैंने
दफ़्न यादों को
कुरेद के निकाला है
कंकालों की शक्ल को
सवारा मैंने
गुज़र गया दिन
या गुज़ारा मैंने
ज़िन्दगी की दौड़ में
थम जाना जुर्म है
रुकने का कर दिया
इशारा मैंने
गुज़र गया दिन
या गुज़ारा मैंने
फुरसत मिली थी
बहुत अरसे के बाद
कर दिया वक़्त को
आवारा मैंने
गुज़र गया दिन
या गुज़ारा मैंने
मेरी परछाईं
तीस साल के फासले पे खड़ा नौजवान
मुझे आईना दिखाता है
और मेरी परछाईं के गले में हाथ डाले
वो मैं बन जाता है
मेरी कमज़ोरिओं से शायद अनजान है
उसके लिए हर मुश्किल आसान है
मेरी उमंगों के फीके रंगों को
नई उमंगों से सजाता है
मेरी परछाईं के गले में हाथ डाले
वो मैं बन जाता है
जवानी का जोश है बरजोर उसमें
मेरे तजुर्बे का है निचोड़ उसमें
मेरी उम्र के मुसे मुसाए लिबासों पे
नयी चरक चढ़ाता है
मेरी परछाईं के गले में हाथ डाले
वो मैं बन जाता है
उन दोनों की महफ़िल में मैं पराया हूँ
दूर खड़ा सदियों पुरानी काया हूँ
मेरी उम्मीदों की परछाईं से दोस्ती कर
वो मुझे भूल जाता है
मेरी परछाईं के गले में हाथ डाले
वो मैं बन जाता है
बंद किताब
जिस पन्ने का मोड़ के कोना
बंद कर दी थी ख़ास किताब
उस पन्ने के सब अलफ़ाज़
मांग रहे दिल से हिसाब
छोड़ अधूरी वो कहानी
जो जीने में जुट गए
अरमां कितने थे जो के बंद
उस किताब मे घुट गए
अब फुर्सत में वक्त की धूल
किताबों से झटकाई
फड़फड़ाते पन्नो से फिर
उस कोने की चीख आयी
थम गया जब पन्ना तो फिर
किरदारों से बात हुई
वक्त पिघल गया और फिर
ना जाने कब रात हुई
लगती थी जो सालों पहले
मन को इतनी रूमानी
ज़िन्दगी के थपेड़ों संग
लगती है अब अनजानी
कहानी के फीके रंगों
में तो अब वो दम नहीं
किरदारों के हाव भाव में
तुम नहीं और हम नहीं
होली का सबक
पक्के रंगों से खेलना छोड़ दिया मैंने
उड़ते गुलाल से रिश्ता जोड़ दिया मैंने
धुल जाने दो दिन की हरकतों को आज की आज
ज़हन से हर कल का हिसाब निचोड़ दिया मैंने
आतिशबाज़ी सिर्फ दिल की धड़कन में हो
आतिशबाज़ी सिर्फ दिल की धड़कन में हो
आसमां में तो मैंने सपने सजाये हैं
रोशिनी गम के तहखानों तक जाये
झरोखों में ऐसे दीपक जलाये हैं
हर शख्स नए लिबाज़ पहन के इतराये
ज़हन से पुराने शिकवे झड़वाए हैं
शक्कर की तानाशाही मिठास पे क्यूँ हो
घोल मेरे जज़्बात ये शेर जो बनाये हैं
आतिशबाज़ी सिर्फ दिल की धड़कन में हो
आसमां में तो मैंने सपने सजाये हैं
एक हिदायत अपनी बेटी के नाम
कुरेदना है तुझे ऊंचाइयों को
शिकस्त करना है खाइयों को
शिखरों से याराना करना है तुझे
बादलों
संग
दम भरना है तुझे
हक़ से मांगेगी तू आसमां का ताज
पर हिदायत ये मेरी तुझको है आज
खुद की हकीकत से जुड़ना तो सीख
उड़ने से पहले तू उड़ना तो सीख
तू सूरत न देखे मंदियों की
खुश-हाल हो राहें बुलंदियों की
तेरे अंदाज़ में कुछ कमी न हो
कमी हो तो आँखों में नमी न हो
हकीकत की हदों से लड़ लेगी तू
हर कमी के आगे बढ़ लेगी तू
तंगियों
में पर सिकुड़ना तो सीख
उड़ने से पहले तू उड़ना तो सीख
इरादों को अपने इशारा तो दे
जज़्बे को अपने एक नारा तो दे
हौसले को अपने दे एक चेहरा
मंज़िल पे परचम तू अपना लहरा
बदलेंगी राहें जब बदलें हालात
बदलना है तुझे भी इन सब के साथ
हालातों के साथ तू मुड़ना तो सीख
उड़ने से पहले तू उड़ना तो सीख
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