Sunday, October 30, 2016

मेरी परछाईं

तीस साल के फासले पे खड़ा नौजवान
मुझे आईना दिखाता है
और मेरी परछाईं के गले में हाथ डाले 
वो मैं बन जाता है

मेरी कमज़ोरिओं से शायद अनजान है 
उसके लिए हर मुश्किल आसान है
मेरी उमंगों के फीके रंगों को
नई उमंगों से सजाता है
मेरी परछाईं के गले में हाथ डाले 
वो मैं बन जाता है

जवानी का जोश है बरजोर उसमें
मेरे तजुर्बे का है निचोड़ उसमें
मेरी उम्र के मुसे मुसाए लिबासों पे
नयी चरक चढ़ाता है
मेरी परछाईं के गले में हाथ डाले 
वो मैं बन जाता है

उन दोनों की महफ़िल में मैं पराया हूँ
दूर खड़ा सदियों पुरानी काया हूँ
मेरी उम्मीदों की परछाईं से दोस्ती कर
वो मुझे भूल जाता है
मेरी परछाईं के गले में हाथ डाले 
वो मैं बन जाता है

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