जिस पन्ने का मोड़ के कोना
बंद कर दी थी ख़ास किताब
उस पन्ने के सब अलफ़ाज़
मांग रहे दिल से हिसाब
छोड़ अधूरी वो कहानी
जो जीने में जुट गए
अरमां कितने थे जो के बंद
उस किताब मे घुट गए
अब फुर्सत में वक्त की धूल
किताबों से झटकाई
फड़फड़ाते पन्नो से फिर
उस कोने की चीख आयी
थम गया जब पन्ना तो फिर
किरदारों से बात हुई
वक्त पिघल गया और फिर
ना जाने कब रात हुई
लगती थी जो सालों पहले
मन को इतनी रूमानी
ज़िन्दगी के थपेड़ों संग
लगती है अब अनजानी
कहानी के फीके रंगों
में तो अब वो दम नहीं
किरदारों के हाव भाव में
तुम नहीं और हम नहीं
No comments:
Post a Comment