Sunday, October 30, 2016

बंद किताब

जिस पन्ने का मोड़ के कोना 
बंद कर दी थी ख़ास किताब
उस पन्ने के सब अलफ़ाज़ 
मांग रहे दिल से हिसाब 
छोड़ अधूरी वो कहानी 
जो जीने में  जुट गए 
अरमां कितने थे जो के बंद
उस किताब मे घुट गए 
अब फुर्सत में  वक्त की धूल
किताबों से झटकाई
फड़फड़ाते पन्नो से फिर 
उस कोने की चीख आयी 
थम गया जब पन्ना तो फिर
किरदारों से बात हुई  
वक्त पिघल गया और फिर
ना जाने कब रात हुई 
लगती थी जो सालों पहले
मन को इतनी रूमानी 
ज़िन्दगी के थपेड़ों संग  
लगती है अब अनजानी
कहानी के फीके रंगों 
में तो अब वो दम नहीं
किरदारों के हाव भाव में
तुम नहीं और हम नहीं 

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