Saturday, June 21, 2025

मुजस्समा mujassamma

मुजस्समा खुद का मैंने ख्यालों में तराशा है

मुकम्मल है जो ख़्वाबों में, हकीकत में हताशा है 

मुझे न मिल सका वो शक़्स जो हर पहलू से उम्दा हो 

हज़ारों आइनों में मैंने उसी को ही तलाशा है 


तेरी शिद्दत, तेरी फितरत, तेरा जज़्बा ही सब कुछ है

हुस्न तेरा, अदा तेरी, ये जलवा तो तमाशा है


बस एक वो बात है मुझ में ज़माने से जो ऊपर है

मुझे तेरी ही रग रग से मुहब्बत बेतहाशा है 


हैवानों से क्या बोलें वो कड़वाहट ही चखते हैं 

वो क्या जानें के मीठापन तो चाहत का बताशा है  


मुक्तलिफ़ ज़ुबानों से ये दुनिया बट गयी ऐसे 

आशिकाना शायरी ही जुड़वाने की भाषा है 


Saturday, April 12, 2025

याद न करना yaad na karna

कभी ज़रुरत तुम्हें पड़े तो

हमारे दर को याद न करना

उजड़ रहा जो तुम्हारे गम में  

उस दिल को बर्बाद न करना

वही मुहब्बत जिसे दफन कर

आखिर अब हम संभल रहे हैं

उसी कब्र पे फूल चढ़ा कर

कोई नया फसाद न करना  

मुहब्बतों पे शेर लिखे थे

जफ़ाओं पे जो बली चढ़े हैं

महफिलों में कभी सुनो तो

मचल के फिर इरशाद न करना

बंधा के खुद को हम बेड़ियों में 

समझौतों में जो जी रहे हैं

इन बंधनों में सुकून है अब

इनसे तुम आज़ाद न करना

हुई है तुमसे जो भूल अब वो

सुधरने की गुंजाइश कम है

सुधारने का जो मन बने तो

मुआफी की फ़रियाद न करना 

कभी जो मुझसे नज़र मिले तो 

शर्म से आँखें झुकाना मत तुम

खता जो की है गिला तुम उसका

इन हरकतों के बाद न करना 


Saturday, March 22, 2025

छिड़ी हुई है जंग chidi hui hai jang

छिड़ी हुई है जंग कहीं दूर दराज़ में

बारूद और चीखें घुलें एक आवाज़ में  

पिस रहे हैं लोग याहवेह खुदा के बीच 

और दुआ मांगते हैं  शुमाह और नमाज़ में 

छिड़ी हुई है जंग कहीं दूर दराज़ में


हैं सब सियासतें तमाशाई इस कदर

के हल ढूंढ़ती हैं महज़ अलफ़ाज़ में 

छिड़ी हुई है जंग कहीं दूर दराज़ में 


हार जीत  सरहदें हैं मसला-ऐ-ज़िन्दगी 

और जान चल रही है मौत के मिज़ाज में    

छिड़ी हुई है जंग कहीं दूर दराज़ में 


शतरंज नहीं है ये इस बिसात में है खून

ऐतबार करें तो प्यादे किस चाल बाज़ में 

छिड़ी हुई है जंग कहीं दूर दराज़ में 


मंडरा रहे हैं गिद्द मुर्दों को नोचते हैं

एक और जंग छिड़ेगी चील और बाज़ में 

छिड़ी हुई है जंग कहीं दूर दराज़ में   


अब गले से लगा लो एक दुसरे का दीन

और कुछ नहीं रक्खा है इस अमन के राज़ में

छिड़ी हुई है जंग कहीं दूर दराज़ में  

Tuesday, March 4, 2025

प्रथम वंदना pratham vandana

मोह छल कपट रहित

निःस्वार्थता सहित

सभ्य शांत और कुलीन 

सत वचन में विलीन 

प्रेम की भण्डारिणी 

मोहिनी मन मोहिनी 


शुद्धता की प्रतीक

हर कथन में एक सीख

नम्रता व्यवहार में 

दृढ़ता विचार  में

कोमल ह्रदय की स्वामिनी

मोहिनी मन मोहिनी


चट्टान आपदाओं में 

सादगी दुआओं में 

ब्रह्माण्ड उसकी गोद में

निर्वाण उसके शोध में 

मेरी मार्गदर्शिनी

मोहिनी मन मोहिनी


मुझे दिया है ज्ञान पर

अंकुश अभिमान पर

गर्व मेरी शान पर

जान मेरी जान पर

माँ नहीं पारसमणि

मोहिनी मन मोहिनी 

Sunday, March 2, 2025

तुम्हें पता क्या tumhein pata kya

तुम्हें पता क्या तुम्हारा आँचल

हवा को क्या क्या बता रहा है

तुम्हारे दामन से यूं लिपटके

वो राज़-ऐ-उल्फत जता रहा है

ये जो खज़ाना मासूमियत का

मुआशरों में नुमाइशी है 

उसी के पीछे छुपी शरारत 

ज़माने भर को दिखा रहा है


ये चिलमनों की तहें हटाकर   

कह जाती हो तुम जो एक नज़र में

उसी नज़र को जो हम पढ़ें तो

लगे है पूरा खत आ रहा है


इश्क़ और जंग में सही गलत क्या

रिवायतों से हम हैं मुखातिब 

सही सही की राह चले पर  

ख्याल मन में गलत आ रहा है


तुम्हारे गालों पे लट तुम्हारी 

ये हरकतें कर रहीं है कैसी 

सम्भालो ज़ुल्फ़ें इरादा इनका

सुलझे हुओं को उलझा रहा है 


हमारे शेरों में वो ज़राफ़त 

को सुनके तुमने इशारा समझा  

फिर जो तबस्सुम छुपाई तुमने

हमारा दिल मुस्कुरा रहा है 


गली से गुज़री झुकाये नज़रें  

सड़क पे शायद रही तवज्जु

पलट के देखा हमें तो समझे 

हमारा जादू भी छा रहा है

Thursday, January 30, 2025

उफ़ुक़ ufuq

उफ़ुक़ के उस पार कहीं एक झिलमिल दुनिया बस्ती है 

उजिआलों में जश्न मनें और अंधेरों में मस्ती है  

तूफानों में पतंग उड़ाएं बरसातों में मेले हैं 

यारों की टोली होती हैं, और यारी के रेले हैं

खुशियों के बाज़ार लगें हर चीज़ वहां पे सस्ती है 

उफ़ुक़ के उस पार कहीं एक झिलमिल दुनिया बस्ती है 


नाकामी के बोझ बिना तो हर एक शक़्स इतराएगा

ऐसा है माहौल वहां के जो चाहेगा पायेगा 

हर खिड़की पे लटक रहे हैं रंग बिरंगे सपने भी

हाथ बढ़ाओ और पकड़ लो, प्यारों के और अपने भी

साम दाम और दंड भेद की डूब रही हर कश्ती है 

उफ़ुक़ के उस पार कहीं एक झिलमिल दुनिया बस्ती है 


दौड़ रहा मैं देखो कैसे उस बस्ती तक जाने को

उस जन्नत की रंगरलियों को सबके साथ मनाने को

मेरी मंज़िल का ठिकाना उस उफ़ुक़ के आगे है

पर ये कम्बख्त उफ़ुक़ मेरे आगे आगे भागे है

उस बस्ती की एक झलक को मेरी आँख तरसती है

उफ़ुक़ के उस पार कहीं एक झिलमिल दुनिया बस्ती है 


तूफानों से जूझ रहा मैं, बरसातों में भीग रहा

साम दाम और दंड भेद के सारे सबब सीख रहा

छीना छपटी सपनों की है, मैं भी तो इस होड़ में हूँ 

पा जाने की दौड़ लगी है, मैं भी तो इस दौड़ मैं हूँ 

ऐसे ही सारी दुनिया इस माया जाल में फस्ती है 

उफ़ुक़ के उस पार कहीं एक झिलमिल दुनिया बस्ती है


Tuesday, December 17, 2024

केकई kekayi

ये क्या मांग लिया केकई ने

मर्यादा को पार किया

ममता की हुंकार सुनी और

रामचंद्र पे वार किया

नियम नहीं तोड़े अपने  

वरदानों का भोग था वो

उसकी नियति में उपयुक्त 

समय का संजोग था वो 

उसको हम ठहराएं दोषी

दृष्टिकोण अपना अपना

महत्वाकांक्षा ने जिसकी

देखा स्वार्थ भरा सपना

भाग्य से जो लड़ना हो तो

संघर्ष तो करना होगा

निःस्वार्थता की देवी को  

कई बार मरना होगा 

साम दाम और दंड भेद हैं

हर एक केकई के हथियार 

उसका सच है उसका सपना

व्यर्थ है अन्य हर विचार 

कसौटी जब ममता की हो 

तो केकई के इस व्यवहार 

में दिख जायेगा तुमको भी 

एक माँ का असीमित प्यार 

रामचंद्र ने भी केकई को

इसी लिए सम्मान दिया 

हम ही उसको दुष्ट माने और

खलनायक का स्थान दिया