Wednesday, December 29, 2021

हक़ है तुझे

तू फासले बनाये रख

ये हक़ है तुझे

उल्फतें दबाये रख

ये हक़ है तुझे

ये दिल ही के जज़्बात हैं 

जो ज़्याती मामलात हैं 

तू हमें पराए रख

ये हक़ है तुझे 


तेरे बहुत अज़ीज़ हैं

अदाओं के मरीज़ हैं

ये रोग तू फैलाये रख

ये हक़ है तुझे


जो तेरे दीवानें हैं

फितरत से परवाने हैं

तू शम्मा जलाये रख

ये हक़ है तुझे


उस नज़र में बयान है

तेरी चाह का सामान है

तू नज़रें झुकाये रख

ये हक़ है तुझे 


बेशक हमें बदनाम कर 

बेइज़्ज़त सर-ए-आम कर

खुद दामन बचाये रख

ये हक़ है तुझे


Saturday, October 23, 2021

आव्यशकता


भावनाओं की अभीव्यक्ति

आव्यशक प्रतीत होती है 

कोई अति-विशेष व्यक्ति  

आव्यशक प्रतीत होती है


हमने उपेक्षा अनुसार

निडर हो, कर दिया उच्चार 

अब आपकी ओर से आसक्ति 

आव्यशक प्रतीत होती है

 

क्षमता आलिंगन में नहीं

आपके मधुर कथन में है

अधरों से निकली वो शक्ति

आव्यशक प्रतीत होती है 


भेद भाव विचारों में होंगे 

इन भेद भावों का स्वागत है

ये वार्तालापों की युक्ति

आव्यशक प्रतीत होती है


ये संबंधों में संदेहमयी 

आलोचनाएं भी आएँगी

मन में इस विचरण से मुक्ति

आव्यशक प्रतीत होती है


मेरे अंतर्मन का दृश्य 

सम्पूर्णता की मूरत तुम हो 

सम्पूर्णता की ऐसी भक्ति 

आव्यशक प्रतीत होती है  


Sunday, August 8, 2021

मुकम्मल रिश्ते


ये रूहानी ही सही पर दुरुस्त निस्बत तो है

मेरा मुस्तकबिल नहीं  तू  मेरी किस्मत तो है 


ये शायराना ही सही पर मेहफ़ूज़ नाता तो है

तू मेरी ग़ज़ल में नहीं पर ज़िक्र तेरा आता तो है 


ये जिस्मानी ना सही बिष कीमत रिश्ता तो है

हवस नहीं इबादत है ये और तू फरिश्ता तो है


उल्फत नहीं, कुर्बत नहीं पर ज़हीन जज़्बात तो हैं

अधूरी हसरतों से भरे पर हसीं हालात तो हैं


Sunday, June 20, 2021

यकीन है मुझको के चाहती हो तुम मुझे

यकीन है मुझको के चाहती हो तुम मुझे 

ख़्वाबों में अपने रोज़ बुलाती हो तुम मुझे 

के घूमता रहता हूँ ख्यालों में रात दिन 

घुमा घुमा के रोज़ थकाती हो तुम मुझे 

यकीन है मुझको के चाहती हो तुम मुझे 


अरमान तुम्हारे भी मुकम्मल ज़रूर हों

शिकवे गिले जो हैं एक इशारे से दूर हों

शिद्दत से जो करती हो वो सुनते हैं दुआ हम 

दुआओं की बंदिश में बंधाती हो तुम मुझे 

यकीन है मुझको के चाहती हो तुम मुझे 

 

संजीदगी से ज़िन्दगी को देख लो मगर

सफर तो सिर्फ एक है, पर लाख हैं डगर 

हंसी ख़ुशी चलती रहो पर याद ये रखो 

हंसाता तुम्हें मैं हूँ, हंसाती हो तुम मुझे

यकीन है मुझको के चाहती हो तुम मुझे 


कितना भी धकेलो मुझे तुम फ्रेंड ज़ोन में 

तस्वीर मेरी छिपी तुम्हारे भी फ़ोन में

अपनी अदाओं से और अपने ही लहज़े से 

फेसबुक के ज़रिये रिझाती हो तुम मुझे

यकीन है मुझको के चाहती हो तुम मुझे  


Sunday, June 13, 2021

दराज़ों में कागज़

 दराज़ों में वो कागज़ हैं जिन्हें स्याही नहीं भाई

वो लव्ज़ों का तकाज़ा था के आँखें मेरी भर आईं 

लिखावट और मेरे आंसूं लिपट के यूं जो रोये थे

के गल के बह गयी वो नज़्म जो फिर लिक्खी न दोहराई


हुनर मेरे कलम का तो ज़माने को न रास आया

मुहब्बत की फतह का गीत अकेले मैंने ही गाया 

कदरदानों की महफ़िल में बिके थे शेर बस इस खातिर

के अपने दिल के घावों को ही मैंने पेश फ़रमाया 


सफेदी है जो बालों में वही तो स्याही है मेरी

वो किस्से हैं मुहब्बत के वही रुबाई है मेरी

वो बेरंग हैं ये कागज़ और वो बेरंग है ये स्याही भी

इसे पढ़ना नहीं आसान  के ये तन्हाई है मेरी


अभी उम्मीद नहीं छोड़ी के मेरे शेर पढ़ोगी तुम

वो पत्थर दिल भी पिघलेगा के मेरी ओर बढ़ोगी तुम

वो कागज़ जो दराज़ों में छुपे बैठे थे इतने दिन

के अपनी सुर्ख वफाओं से हाँ उनपर कुछ लिखोगी तुम


Saturday, June 12, 2021

शांत ज्वालामुखी

 न बादल घिरते हैं  

न झूमते दरख़्त

न बिजली के चौंधे

से थमता है वक़्त

अंदर तो आंधी है 

मन में ही बाँधी है  

सुकून-ए-सूरत है  

उबलता है रक्त 


Thursday, June 3, 2021

छोटी सी खिड़की

 एक छोटी सी खिड़की से

क्या क्या बसर हुआ 

लगता हवा का झोंका था

तूफां सा असर हुआ 


चाँद मासूम लगता था

चंचल तो चांदनी थी

थिरकती रही नज़रों में

पलकों में बांधनी थी


वो नोंक झोंक की चिलमन

जो सरकाई धीरे धीरे

एक हसीन शख्सियत 

नज़र आयी धीरे धीरे


ये खिड़की खुली है

और खुली ही रहेगी

उम्मीद उन अदाओं से 

चुलबुली ही रहेगी