Sunday, October 30, 2016

रंगरेज़

वक़्त के निशां तेह बनकर
दीवारों पे बस्ते गए
हम मसरूफ ज़िन्दगी में
कुछ रोते कुछ हस्ते गए
वो बढ़ते कद का हिसाब
स्याही की सीढ़ी रखने लगी
ज़ायकेदार छौंकों का मज़ा
दीवारें भी चखने लगीं
टंगी हुई तस्वीरों के पीछे
मानो लगी परछाईं थीं
तसवीरें तो बदल गयीं
वो यादें वहीँ समाईं थीं
बचपन के नन्हे हाथों की
छाप नज़र आ जाए कहीं
अल्हड़पन की शख्सियत ने
परचम हैं चिपकाये कहीं
त्योहारों की बात करें तो
पूजा में छींटे रोली के
और छेड़ छाड़ में बिखर गए
वो रंग हमारे होली के
वक़्त के निशां तेह बनकर
दीवारों पे बस्ते गए
हर निशाँ मिटाकर रंगरेज़
अपने अपने रस्ते गए

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