Sunday, October 30, 2016

बचपन का मोहल्ला

बचपन का मोहल्ला था मासूमियत की गली थी ज़िन्दगी को परखने की दो दिलों में खलबली थी लड़कपन के मैदानों में जवानी से मुलाक़ात हुई यारी के चौराहे पे मुहब्बतों की बात हुई गेंद बल्ला चोर सिपाही यह खेल भी खेले थे हमारे लिए तो दुनियादारी मस्त दिवाली मेले थे ज़िन्दगी की दौड़ भी दौड़ी साथ साथ ही दौड़े थे यार के सर पे बोझ पड़ा तो कंधे अपने चौड़े थे कच्ची पक्की नसीहतों को आपस में बांटा करते थे भले बुरे का फर्क भी खुद ही आपस में छाँटा करते थे उम्मीदों के महल बनाते छुट्टी की दोपहरों में छोटी छोटी फ़तेह को तकते एक दूजे के चेहरों में वक़्त आया जब इस दिल को देने का नाज़ुक हाथों में कैसे दायरा बढ़ा दिया यारी का चंद मुलाकातों में दो यारों से चार हुए तो यारी के रंग कुछ और चढ़े हैं यारी लव्ज़ कुछ छोटा है ये तालुक्कात कुछ और बढ़े हैं अंकल चाचा के ओहदों से खुद अपनी हस्ती बढ़ा ली है हर मौके पे ना ना करते भी थोड़ी बहुत चढ़ा ली है दिल से पूछो क्या मिलता है हम को इन मुलाकातों में? ऐसा क्या है इस रिश्ते में क्या लुत्फ़ पुरानी बातों में? लड़कपन का आईना तू है बचपन का है खज़ाना तू ठहाकों वाली हंसी तेरे संग बेफिक्र ख़ुशी का ठिकाना तू! सालगिरह पे सलाह है तुझको जन्नत की हसरत करना मत यहीं है जन्नत, यहीं है कुर्बत तब्दील-ए-फितरत करना मत

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