ज़िन्दगी में पिरो लिए
फलक के कुछ सितारे
एक चाँद भी चमकता रहा
बगल में हमारे
हसरतों की पतंगें
हवाओं में नचाईं है
अपने इस घरौंदे में
वही पतंग सजाईं है
घुप ग़मगीन अंधेरों में भी
उम्मीदों को ही टटोला है
एक दूजे का हाथ पकड़
हर नया झरोखा खोला है
दो फुलझड़ियाँ हैं अपनी भी
हर रात दिवाली करती हैं
इस गठबंधन की गुल्लक में
ये मुस्कानें तो भरती हैं
दुनियादारी की सख्त धूप में
जब जब झुलसे अपने पाँव
कई दरख़्त हैं इस महफ़िल में
जिनने दी है हमको छाँव
नोंक झोंक में गुज़र गए
कितनी जल्दी पच्चीस साल
ये वैसी की वैसी देखो
पर सफ़ेद हो गए मेरे बाल
हलके फुल्के और गहरे भी
ऐसे हैं अपने जस्बात
बैंड बाजा बजा के निकली
ये पच्चीस बरसों की बारात!
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