Thursday, October 17, 2024

वजह vajah

तय शुदा समय नहीं हो, कुछ उलझी गिरेह नहीं हो

तेरे पास वक़्त गुज़ारूं पर कुछ वजह नहीं हो


ये दूरी की दिक्कतें हैं  के मकसद को ढूंढ़ती हैं

किस बिना पे राब्ता हो जो वाजिब बिना नहीं हो


फासलों का खालीपन ये रातों में गूंजता है

ये सिलसिला रहेगा जब तक सुबह नहीं हो


मशग़ूलियत है तेरी और मेरी मुश्किलें हैं

ये तो कश्मकश रहेगी जब तक सुलह नहीं हो


ये मुआशरा है कैसा तुझे चाहना गुनाह है

कोई जगह तो हो जहां इश्क़ गुनाह नहीं हो 


लिख लिख के मैं कसीदे भरता हूँ डायरी में

लिखता रहूँ मैं जब तक आखरी सफह नहीं हों


Saturday, September 21, 2024

मैं भटक गया था main bhatak gaya tha

 मेरे सामने थी मंज़िल 

पर मैं भटक गया था 

सब कुछ था मुझको हासिल  

पर मैं भटक गया था 


करी इश्क़ की वकालत 

जीती हुई थी बाज़ी 

मेरा दिल था मुव्वक्किल 

पर मैं भटक गया था 


वो कारवाँ था जिसमें 

हर ख्वाब था मयस्सर 

थी तू भी उसमें शामिल

पर मैं भटक गया था 


तूफ़ान से बचाके

मैं कश्ती लेके आया

वो सामने था साहिल

पर मैं भटक गया था


शेरों को मेरे सुनने 

बेसब्र था ज़माना

पूरी सजी थी महफ़िल

पर मैं भटक गया था


Thursday, September 5, 2024

अच्छा लगता है ahcha lagta hai

 

अंधेरों से बाहर आना अच्छा लगता है

इन आँखों का चौंधियाना अच्छा लगता है

नई नस्ल के नए तरीके हम भी सीखेंगे 

अपनी हिकमत को चमकाना अच्छा लगता है      


शिकनों के घावों को हम तनहा सेह लेंगे  

महफिलों में मुस्कुराना अच्छा लगता है


हम दौड़ लिए दुनियादारी की रफ्तारों से

अब इन लम्हों को टहलाना अच्छा लगता है 


दूर चले जाते हैं जिनको जाना होता है 

तेरा जाके वापस आना अच्छा लगता है 


दिल न मांगे इतना सब कुछ  तेरी निस्बत से 

महज़ नज़र का एक नज़राना अच्छा लगता है


साथ तेरे चलते चलते जब पीछे रह जाऊं 

तेरा थोड़ा सा घबराना अच्छा लगता है


मुरीद हुई आखिर मेरी तू इतनी शिद्दत बाद

अब तुझे थोड़ा तरसाना अच्छा लगता है 

  

सच्चाई जैसी हो अपनी वैसी जी लेंगे

पर हम दोनों का अफसाना अच्छा लगता है 


मेरे शेरों को ये दुनिया चाहे न चाहे  

तेरा उनको गुनगुनाना अच्छा लगता है


Monday, June 24, 2024

नफरत की देहलीज़ nafrat ki dehleez

नफरत की देहलीज़ पे

कितने तबाह हुए 

सदियों की तारीख में

क्या क्या गुनाह हुए

नफरत को क्या कोसें 

कुछ मज़हबी इश्क़ के 

खुशवहमी ख्याल में 

पूरे फनाह हुए


भरे बाज़ार ज़ुल्म को

रोकें तो किस तरह 

मूक, बधिक और अंधे

सारे गवाह हुए


टीस उठे जब दर्द की

बेबस रुलाई में

गैरों का शोक मानकर 

सब बेपरवाह हुए

 

किसने किसकी जान ली

हुआ पहला वार क्यों 

अफवाहों की भीड़ में 

हम खुद अफवाह हुए


जो लड़ रहा है सोच 

तुझे हांकता है कौन 

कौन चाहता है जंग ये

बिना सुलह हुए 


बैठे दूर दराज़ जो 

चिंगारी को दें फूंक 

दरबार-ऐ-हार-जीत में   

वो जहाँपनाह हुए

Sunday, June 16, 2024

मेरी लिखावट meri likhaavat

तलाशा है 

ज़माने ने

मुझे मेरी

लिखावट में

उलझे फिर  

रहे हज़रात

ये लव्ज़ों की

सजावट में


नहीं समझे 

के मकसद और 

है सुनने

सुनाने का 


वो तहखाना 

तुम्हारा है

ये शेरों की

इमारत में 


भरी महफ़िल

में सुनते हो

वो किस्से जिस 

खुदाई के


सजदा उस को  

तुम करते हो  

छुप छुप कर

इबादत में


मेरे शेरों

की वाह वाही 

जो करते हो 

तहे दिल से 


है अरमानों 

की जिरह वो 

तुम्हारी ही

वकालत में


कभी मरहूम

मुहब्बत हो

हो एक तरफ़ा 

कभी वो इश्क़


है मरहम का 

सौदा नज़्म 

जो पढ़ता मैं 

तिजारत में 


कभी हो ज़ुल्म

अज़ीज़ों पर 

हुकूमत की

बदौलत तो 


जज़्बे को मैं

करता सख्त 

सुनाकर शेर

बग़ावत में 


तुझे ओ हुस्न

जो करती है

मुझपर ज़ुल्म

ही दिन-बर-दिन


लिखे लहू 

से दिल पर शेर

नज़र तुझपर

सदाकत में 

Friday, May 3, 2024

ख़ुशी khushi

 गिन्नियों की खनक में

महफिलों की चमक में

कामयाबी की हदों में 

झिलमिल शोहरतों में 

ढूंढी बहुत पर नहीं मिली 

तुतलाती ज़ुबानों में 

तकिये  सिरहानों में 

दादी के मर्तबानों में 

मिलने के बहानों में

यारों के ठिकानों में 

दिल-फैंक अफसानों में

ख़ुशी बिखरी पड़ी मिली 


Saturday, April 20, 2024

रफ़्तार कारवां की raftaar kaarvaan ki

 रफ़्तार कारवां की

अब कम हो चली है

जद्दोजहद सब  

हज़म हो चली है

देते थे सराब

मकसद-ऐ-ज़िन्दगी

अब ज़िन्दगी खुद 

वहम हो चली है

लुत्फ़ आशिकी के

माशूक संग मनाये

ये माशूक किसीकी 

बेगम हो चली है

इत्र की मिलावट

साँसों में याद उनकी 

कम्बख्त याद अब वो

मरहम हो चली है

देखते थे सपने

दोनों जिस नज़र से

उम्र संग नज़र भी

कुछ नम हो चली है

संजीव क्या लिख्खे 

मसले सब तरफ हैं 

ये कायनात मेरी

कलम हो चली है